ब्लू ड्रम वाली मुस्कान ही नहीं, इन महिलाओं को भी मिली थी मौत की सजा; फिर क्यों नहीं हुई फांसी?
मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी को फांसी की सजा सुनाई गई है, जिससे भारत में महिलाओं को मिलने वाली मृत्युदंड पर चर्चा तेज हो गई है।

मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान को फांसी की सजा

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मृत्युदंड यानी मौत की सजा भारतीय कानून के तहत दी जाने वाली सबसे कठोर सजा में से एक है। क्योंकि कोर्ट सबसे खतरनाक मामलों में ही मृत्युदंड देते हैं, फिर भी असल में बहुत कम दोषियों को फांसी दी जाती है इसीलिए किसी महिला को फांसी देना और भी दुर्लभ है।
इस बार की चर्चा इसलिए हो रही है क्यंकि मेरठ के बहुचर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में बुधवार को जिला अदालत में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई है। एक साल से ज्यादा चली सुनवाई और 22 से ज्यादा गवाहों के बयान के बाद कोर्ट ने दोनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई।
मुस्कान रस्तोगी को फांसी की सजा के बीच यह सवाल अहम हो गया है कि अब तक आजाद भारत में कितनी महिलाओं को फांसी की संजा सुनाई गई और अब तक कितने मामलों में सुनवाई चल रही है।
किन महिलाओं को मिली मौत की सजा?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जेलों में कुल 571 डेथ-रो कैदी हैं, जिनमें 21 महिलाएं हैं। इनमें कुछ महिलाओं की सजा पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, जबकि कुछ मामलों में दया याचिका लंबित है। इनमें उत्तर प्रदेश की शबनम का मामला सबसे चर्चित है।
2008 में शबनम को अपने परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। 2010 में उसे मौत की सजा मिली, जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। उसकी रिव्यू याचिका भी खारिज हो चुकी है और दया याचिका भी खारिज हो चुकी है। इसके बावजूद अब तक उसे फांसी नहीं दी गई।
21 महिलाओं में से 9 यूपी की
डेथ रो पर मौजूद 21 महिलाओं में 9 महिलाएं उत्तर प्रदेश से हैं यानी कुल संख्या का करीब आधा हिस्सा। इनके अलावा केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की महिलाएं भी डेथ रो पर हैं।
इनमें कुछ महिलाओं की मौत की सजा अभी हाई कोर्ट से कन्फर्म नहीं हुई है। जैसे गीता देवी, जालधारा, रूपा सिंह, नजीमा और हसीमा के मामलों में अपील या पुष्टि की प्रक्रिया लंबित है।
सजा के बाद लंबा इंतजार
कई मामलों में सालों से इंतजार कर रही इन महिलाओं में कुछ को मौत की सजा मिले एक दशक से ज्यादा वक्त हो चुका है। आंकड़ों के मुताबिक शबनम करीब 15 साल से, फेहमिदा 16 साल से और सोनम डागर तथा किरण बाई करीब 11 साल से डेथ रो पर हैं।
फेहमिदा को 2003 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में 2009 में मौत की सजा सुनाई गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2012 में इसे बरकरार रखा, लेकिन उनका मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सोनम डागर को 2014 में मौत की सजा मिली थी।
हाई कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में उनकी फांसी पर रोक लगा दी। वहीं किरण बाई की मौत की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी है, लेकिन उनकी दया याचिका अभी राज्यपाल के पास लंबित है।
फांसी की सजा के बाद भी क्यों नहीं होती फांसी?
भारत में ट्रायल कोर्ट से मौत की सजा मिलने के बाद मामला वहीं खत्म नहीं होता। डेथ सेंटेंस को हाई कोर्ट से कन्फर्म कराना जरूरी होता है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील, रिव्यू और क्यूरेटिव जैसे कानूनी रास्ते उपलब्ध होते हैं।
इसके अलावा दोषी दया याचिका भी दाखिल कर सकता है। इसी वजह से किसी महिला को ट्रायल कोर्ट से मौत की सजा मिलने और वास्तविक फांसी होने के बीच कई साल का अंतर हो सकता है।
मुस्कान को आज फांसी की सजा मिलना अंतिम फांसी होने के बराबर नहीं है। उनके मामले में भी आगे की कानूनी प्रक्रिया होगी। वहीं भारत में पहले से मौत की सजा पा चुकी 21 महिलाओं में से कई वर्षों से अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं के चलते डेथ रो पर हैं।
आजाद भारत में सिर्फ एक महिला को मिली फांसी की सजा
आजाद भारत में अब तक सिर्फ एक महिला को फांसी की सजा सुनाई गई। साल 1955 में रतन बाई जैन को मृत्युदंड दिया गया था। रतन बाई जैन दिल्ली के एक परिवार नियोजन क्लिनिक में प्रबंधक के रूप में काम करती थीं। वहां उसकी मुलाकात उन तीन लड़कियों से हुई, जिनकी उसने बाद में हत्या कर दी।
रतन को शक था कि इन लड़कियों का उसके पति के साथ संबंध था, जिसके कारण उसने उनकी जान लेने का फैसला किया।रतन बाई ने किसी हथियार का इस्तेमाल करने के बजाय जहर से तीनों लड़कियों को मार डाला।
उस समय सामने आए सबूतों के अनुसार, उसने लड़कियों के खाने-पीने की चीजों में जहर मिला दिया था। जहर इतना तेज था कि तीनों लड़कियों की उसे पीते ही मौत हो गई।
बार में रतन की अपीलों और दया याचिकाओं को खारिज किए जाने के बाद, 3 जनवरी 1955 को फांसी दे दी गई। इससे स्वतंत्र भारत में किसी महिला को फांसी दिए जाने का यह पहला मामला बन गया। आधिकारिक रिकॉर्ड में वह आज भी न्यायिक फांसी का सामना करने वाली एकमात्र महिला हैं।
सोर्स- रतन बाई जैन को फंसी की सजा
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