नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा यूपीएससी परीक्षा के पाठ्यक्रम में परिवर्तन और हिंदी भाषी छात्रों के साथ भेदभाव से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों में जबरदस्त आक्रोश है। आयोग के नए नियमों के विरोध में शनिवार को सैकड़ों छात्रों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। देर शाम उन्होंने कैंडिल मार्च भी निकाला।

प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि लोक सेवा आयोग का रवैया छात्र हित में नहीं है। सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट लागू होने के बाद हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले छात्रों का प्रतिशत गिरा है। हिंदी माध्यम से इस वर्ष मात्र सौ छात्रों ने परीक्षा पास की है। छात्रों ने मांग की है कि आयोग के पाठ्यक्रम में परिवर्तन के बाद तीन अतिरिक्त प्रयास एवं आयु सीमा में भी तीन वर्ष की छूट दी जाए। छात्र सन 1979 में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा पाठ्यक्रम में हुए परिवर्तन के अनुरूप परीक्षा के नियमों में बदलाव चाहते हैं। उस समय लोक नियोजन में समता के अधिकार को संरक्षित करते हुए आयोग द्वारा छात्रों को आयु सीमा में दो साल की छूट तथा तीन अतिरिक्त प्रयास दिए गए थे। इसके बाद भी जब कभी परीक्षा पाठ्यक्रम व नियमों में बदलाव हुए तो छात्रों को आयु सीमा और प्रयासों में छूट दी गई, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ।

बड़ा बदलाव नहीं मानता आयोग

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे छात्र सुनील कुमार सिंह ने बताया कि लोक सेवा आयोग ने यूपीएससी की परीक्षा के मात्र दो माह पहले नियमों में बदलाव की सूचना दी। प्रशासनिक आयोग की अनुशंसा के बाद पाठ्यक्रम में दूसरा परिवर्तन किया गया है, लेकिन अतिरिक्त प्रयास व आयु सीमा में कोई छूट नहीं दी गई है। सुनील ने बताया कि इस बदलाव के संबंध में संासद अविनाश पांडेय ने आयोग के अपर सचिव को पत्र भी लिखा था। गत 8 जुलाई को इसके जवाब में अपर सचिव ने लिखा है कि नियमों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। मुख्य परीक्षा में नए प्रश्न पत्र को शामिल करने को आयोग बड़ा बदलाव नहीं मानता।

सी-सैट का दुष्प्रभाव

इलाहाबाद से मिली जानकारी के मुताबिक, 2011 में यूपीएससी परीक्षा में सी-सैट लागू होने के बाद हिंदी भाषी क्षेत्रों के छात्र प्रतियोगिता से बाहर हो गए। सी-सैट में गणित, रीजनिंग, निर्णयन क्षमता, अंग्रेजी, अंतरवैयक्तिक कौशल, कांप्रीहेंशन से अधिक प्रश्न पूछे जाने लगे। प्रारंभिक परीक्षा से विषय हटा लिया गया। साथ ही आइएएस और पीसीएस का अलग-अलग पैटर्न भी हिंदी भाषी छात्रों के लिए परेशानी का सबब बना। विशेषज्ञ कहते हैं कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले छात्रों का प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में चयन विषय पर अच्छी पकड़ होने के कारण ही होता था। विषय हटने के बाद प्रतियोगी छात्रों के गढ़ माने जाने वाले इलाहाबाद में चयन का ग्राफ अचानक धराशायी हो गया। 2010 की प्रारंभिक परीक्षा में इलाहाबाद से 500 से अधिक छात्रों ने सफलता हासिल की थी। अंतिम रूप से चयनित होने वाले छात्रों की संख्या भी 100 के लगभग थी। वर्ष 2011 में सी-सैट लागू होने के बाद प्रारंभिक परीक्षा पास करने वालों की संख्या सिमट गई और बमुश्किल 150 छात्र प्रारंभिक परीक्षा का बैरियर लांघ पाए। वर्ष 2012 में तो यह स्थिति और खराब हो गई। प्रारंभिक परीक्षा में सफल होने वालों की संख्या सैकड़ा भी नहीं पार कर पाई। 2013 की अभी हाल ही में घोषित प्री परिणाम में भी हिंदी भाषी छात्रों का पत्ता करीब-करीब साफ हो गया है।

कब-कब मिली छूट

-वर्ष 1979 में सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए अधिकतम आयु सीमा 28 वर्ष और तीन प्रयास दिए गए थे।

-वर्ष 1990 में सामान्य वर्ग के लिए अधिकतम आयु सीमा 31 वर्ष और प्रयासों की संख्या चार कर दी गई।

-वर्ष 1992 में सामान्य वर्ग के लिए आयु सीमा 33 वर्ष की गई और पांच प्रयास दिए गए।

क्या हुए बदलाव

-इंडियन फारेस्ट सर्विस में आयु सीमा एक माह घटा दी है।

-पहले मुख्य परीक्षा 27 दिन में समाप्त होती थी, अब यह मात्र 6 दिन में समाप्त होगी।

-चार नए प्रश्नपत्र मुख्य परीक्षा में शामिल

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