ब्रज बिहारी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की कठिन परीक्षा 2024 के लोकसभा चुनाव में होगी। जैसे कभी कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लिए विपक्षी दलों में छटपटाहट दिखती थी, वैसी ही बेचैनी आज भाजपा विरोधी दलों के अंदर नजर आ रही है। पार्टी के रूप में भाजपा की शानदार चुनावी सफलता और व्यक्ति के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता के कौतूहलाकाश में विचरण करने वालों के लिए एक नई पुस्तक आई है- द राइज आफ द बीजेपी : द मेकिंग आफ द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट पार्टी।

इस पुस्तक में भाजपा की कार्यशैली, उसकी विकास यात्रा और इस मार्ग में आए उतार-चढ़ाव का ब्योरा और व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इस पुस्तक के लेखक के रूप में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव का नाम देखकर कोई हैरानी नहीं हुई, लेकिन इला पटनायक का नाम चौंकाने वाला था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अनुशासन और भाजपा के प्रशिक्षण से निखरे भूपेंद्र यादव के लिए अपनी पार्टी की उपलब्धियों पर लिखना स्वाभाविक है, लेकिन जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिक्षित और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित इला पटनायक का इस पुस्तक से जुड़ना भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है। पुस्तक के प्रकाशन के बाद एक साक्षात्कार में इला पटनायक से यह सवाल पूछा गया तो उनका जवाब था, ‘अपने माता-पिता से यही सीखा कि जिसको जानना-समझना है, उसके नजदीक जाइए। मैंने माता-पिता से या जेएनयू में जो सीखा, यह उसका ही परिणाम है।’काश, इस सूत्र को विपक्षी दल भी समझ पाते, तो उन्हें भाजपा के खिलाफ संघर्ष में ही मदद मिलती, लेकिन दुर्भाग्य से अब भी कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल हिंदू और हिंदुत्ववादी के बीच फर्क करने में अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं।

देश की राजनीति में पहले भारतीय जन संघ और फिर उसके नए अवतार के रूप में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नीतियों, कार्यक्रमों और नेतृत्व के दम पर यह सफलता प्राप्त की है। कांग्रेस के तंबू से निकलकर कई पार्टियों ने उसका विरोध किया। इनमें समाजवादी प्रमुख थे, लेकिन विडंबना देखिए कि उनमें इतना ज्यादा बिखराव हुआ कि वे अब सपा और राजद के रूप में परिवार आधारित राजनीति का केंद्र बने हुए हैं। साम्यवादी विचारधारा का तो यह हाल है कि उनके पांव के नीचे की जमीन खिसक चुकी है। केवल भाजपा ही एकमात्र ऐसा दल है, जिसने कांग्रेस विरोध को उसके अंजाम तक पहुंचाया। देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी कप्तानरहित जहाज की तरह हिचकोले खा रही है। फर्क साफ है। भाजपा के नेता जीत के बाद अगले अभियान पर निकल पड़ते हैं, जबकि कांग्रेस के शीर्षस्थ नेता हारने के बाद विदेश भ्रमण पर।आखिर क्या वजह है कि भाजपा लगातार मजबूत होती जा रही है और विपक्ष को उसे परास्त करने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। इस पुस्तक में उन कारणों और परिस्थितियों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

भाजपा पर विपक्षी चाहे जितने आरोप लगाएं कि वह अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम विरोधी है, लेकिन मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हर वर्ग और संप्रदाय के लोगों तक बिना भेदभाव के पहुंच रहा है। लाभार्थियों तक केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं पहुंच रही हैं, बल्कि सरकार के साथ उनका एक रिश्ता भी कायम हुआ है।अक्सर संघ और भाजपा के रिश्तों को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। इस पुस्तक में संघ से जुड़े मजदूर नेता स्वर्गीय दत्ताेपंत ठेंगड़ी के एक कथन से इसे स्पष्ट किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दोनों में अंर्तसबंध तो हैं, लेकिन वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हैं। पुस्तक में कई उदाहरण दिए गए हैं, कई ऐसी स्थितियां बताई गई हैं जब दोनों के विचार अलग-अलग हैं, खासकर आर्थिक मसलों पर।

Edited By: Neel Rajput

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