दलित राजनीति में हिस्सेदारी की नई लड़ाई: 'कोटे के अंदर कोटा' के बहाने मांझी-चिराग में छिड़ा सियासी संग्राम
मांझी और चिराग पासवान के बीच अनुसूचित जाति आरक्षण में 'कोटे के भीतर कोटा' को लेकर विवाद गहरा गया है, ...और पढ़ें


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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। अनुसूचित जाति (एससी) के आरक्षण में ‘कोटे के भीतर कोटा’ को लेकर केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी और चिराग पासवान के बीच बयानबाजी महज आरक्षण नीति का मतभेद नहीं है। इसके पीछे दलित राजनीति में हिस्सेदारी और नेतृत्व की नई लड़ाई भी है।
मांझी के पुत्र एवं बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन एससी आरक्षण की समीक्षा और उप-वर्गीकरण के पक्ष में हैं, जबकि चिराग पासवान इसका विरोध कर रहे हैं। दोनों के बीच विवाद इसलिए भी अहम है कि एक ही सत्तारूढ़ गठबंधन में रहते हुए मामला एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया है।
मांझी 'कोटे के भीतर कोटा' के पक्ष में
बिहार में दलित राजनीति के दो प्रमुख मोर्चे हैं। एक का नेतृत्व जीतनराम मांझी कर रहे हैं तो दूसरे की कमान रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान के हाथ में है। रामविलास के समय भी बिहार की दलित राजनीति अलग-अलग दिशाओं में जाती दिखती थी।
अब अगली पीढ़ी में संतोष सुमन हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) की सियासी विरासत संभाल रहे हैं और चिराग पासवान लोजपा (रामविलास) के प्रमुख हैं। लोजपा (रामविलास) का राजनीतिक आधार 'हम' से बड़ा है। केंद्रीय मंत्री के रूप में चिराग का कद भी संतोष से ऊपर है। ऐसे में दोनों के बीच प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की रस्साकशी भी इस टकराव की एक परत है।
बिहार में ‘कोटे के भीतर कोटा’ की अवधारणा भी नई नहीं है। कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़े वर्ग के भीतर कमजोर समूहों को अलग पहचान देकर 'अति पिछड़ा वर्ग' की राजनीति को आधार दिया था। बाद में नीतीश कुमार ने इसी तर्ज पर पासवान को छोड़कर अन्य दलित जातियों को महादलित श्रेणी में शामिल किया, जिसमें मांझी जाति भी थी।
हालांकि बाद में यह अंतर समाप्त कर दिया गया। अब मांझी खेमा एससी आरक्षण में भी वंचित जातियों की हिस्सेदारी की मांग कर रहा है। उसका तर्क है कि सभी अनुसूचित जातियों को एक ही श्रेणी मानने से कमजोर समूह आरक्षण के लाभ में पीछे रह जाते हैं। मांझी इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के उप-वर्गीकरण संबंधी फैसले का हवाला देते हैं।
दलित राजनीति में नेतृत्व की नई लड़ाई
इस दलील का सियासी गणित भी है। चिराग का मजबूत आधार पासवान समुदाय में है, जबकि मांझी की राजनीति का पारंपरिक आधार मुसहर और अन्य कमजोर दलित समूह रहे हैं। आरक्षण के लाभ के असमान वितरण का सवाल उठाकर मांझी उन समुदायों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें लगता है कि मजबूत दलित जातियों को ज्यादा लाभ मिला है।
मांझी को यह भी अहसास है कि आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की बात करके वह एक बड़े वर्ग का समर्थन भी प्राप्त करने में कामयाब हो सकते हैं। इससे भी चिराग पर बढ़त बनाने में उन्हें मदद मिल सकेगी।
दूसरी ओर, चिराग के लिए उप-वर्गीकरण का विरोध एससी समुदाय की एकजुटता और अपने सामाजिक आधार को बनाए रखने का सवाल है। इसलिए मौजूदा विवाद का असली अर्थ आरक्षण व्यवस्था को बदलने या बचाने से आगे जाता है।
सवाल यह भी है कि बिहार में सबसे वंचित दलितों की राजनीतिक आवाज कौन बनेगा। सबसे वंचित को ज्यादा हिस्सेदारी का मुद्दा मांझी खेमे के लिए सामाजिक न्याय की मांग के साथ-साथ अपने परंपरागत राजनीतिक आधार को मजबूत करने का अवसर भी है।
जाहिर है इस विवाद का असली अर्थ है कि लड़ाई सिर्फ आरक्षण की समीक्षा का नहीं, बल्कि यह तय करने की भी है कि सबसे वंचित दलितों की राजनीतिक आवाज कौन बनेगा।
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