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भोजशाला: विद्या, संस्कृति और आस्था का हजार वर्ष पुराना केंद्र, शिल्प वैभव की अद्भुत धरोहर

Published: Sat, 16 May 2026 07:10 AM (IST)

भोजशाला, राजा भोज द्वारा स्थापित एक हजार वर्ष पुराना संस्कृत विश्वविद्यालय है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का ...और पढ़ें

भोजशाला भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत अध्ययन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक मानी जाती रही है।

भोजशाला भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत अध्ययन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक मानी जाती रही है।

HighLights

  1. राजा भोज ने 1034 ईस्वी में भोजशाला स्थापित की।

  2. यह संस्कृत अध्ययन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

  3. वाग्देवी प्रतिमा 1903 में लंदन ले जाई गई।

जेएनएन, इंदौर। भोजशाला केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत अध्ययन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक मानी जाती रही है। परमार राजा भोज के काल में स्थापित भोजशाला को मां वाग्देवी (सरस्वती) की आराधना, वैदिक अध्ययन और विद्वानों के केंद्र के रूप में पहचान मिली।

विशाल स्थापत्य, नक्काशीदार स्तंभ, यज्ञकुंड और वाग्देवी प्रतिमा ने इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाए रखा। यहां धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, वैदिक आयोजन और वसंत पंचमी महोत्सव आयोजित होते थे। परिसर से कुछ ही किलोमीटर दूर ज्ञानपुरा गांव के बारे में माना जाता है कि परमार काल में यह आचार्यों और विद्वानों का निवास क्षेत्र था।

वाग्देवी प्रतिमा

राजा भोज के समय की विद्वता और शिल्प वैभव की अद्भुत धरोहर है।1034 ईस्वी में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने धार में एक विशाल आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसे आज भोजशाला के नाम से जाना जाता है।

यह संस्थान नालंदा और तक्षशिला की समृद्ध परंपरा का हिस्सा था। वसंत पंचमी के दिन यहां मां सरस्वती की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और लगभग 271 वर्षों तक यह स्थान विश्व में शिक्षा का प्रमुख केंद्र बना रहा। श्वेत संगमरमर से उच्च उत्कीर्णन शैली में निर्मित यह मूर्ति तत्कालीन मूर्तिकला कौशल की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है।

सुनवाई के दौरान यह बताया गया कि वर्ष 1875 में ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि मेजर जनरल विलियम किकेड ने मंदिर परिसर की खोदाई करवाई थी। इस दौरान मुस्लिम शासकों द्वारा वहां गाड़ी गई वाग्देवी की मूर्ति को बाहर निकाला गया। वर्ष 1903 में लार्ड कर्जन इस मूर्ति को अपने साथ ले गए और उन्होंने इसे लंदन के संग्रहालय में रखवाया। तबसे यह वहीं है।

इतिहासकारों के अनुसार, यह प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली थी। देवी के सिर पर मुकुट और सुसज्जित केश विन्यास उनकी दिव्यता और गरिमा को दर्शाते हैं। इसके आधार भाग पर संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में उकेरे अभिलेख के अनुसार वररुचि नामक विद्वान ने वाग्देवी सहित तीन प्रतिमाओं का निर्माण करवाया था। मूर्ति लगभग 128.5 सेमी ऊंची, 58.6 सेमी चौड़ी है। इसका अनुमानित भार करीब 250 किलो माना जाता है।

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