नई दिल्‍ली, सीमा झा। ‘क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,

कालिमा तो दूर छाया भी पलक पर थी न छाई,

आंख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती

थी हंसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,

वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना।

पर अस्थिरता पर समय की मुस्कुराना कब मना है...,

है अंधेरी रात, पर दीया जलाना कब मना है!’

अपनी उपरोक्त कविता ‘अंधेरे का दीपक’ में हरिवंश राय बच्चन ने उक्त पंक्तियां चाहे जिस मनोदशा में लिखी हों, पर आज के अनिश्चितता से भरे समय में ऐसी पंक्तियां उम्मीद की किरण जगाती हैं। मुश्किल समय में हमें ऐसी ही प्रेरणा, ऐसे ही परिवेश की जरूरत होती है, जिसमें खुद समाधान तलाशने और आगे बढ़ने के लिए प्रयास करने की सीख मिले। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आरती आनंद के मुताबिक, ‘विकल्प आपके पास हमेशा मौजूद होता है। या तो आप वर्तमान परिस्थिति से उपजे नकारात्मक परिणामों के बारे में सोचकर सिर पकड़कर बैठे रहें या फिर अपने अंधियारे मन को दीया जलाकर रोशन कर दें। समस्या के बारे में न सोचकर बस समाधान पर फोकस करें।’

डॉ. आरती कहती हैं कि यदि आप टीके के बारे में सोचकर या कल कैसा होगा, यह सोचकर परेशान हो रहे हैं तो इससे अपनी स्थिति को बेहतर करने का प्रयास भी नहीं कर सकेंगे। इसलिए जो हमारे नियंत्रण में नहीं, उन चिंताओं से खुद को दूर ले चलें। वह करने का प्रयास करें, जो हमारे नियंत्रण में हैं और हमें बेहतर कल की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त हैं।

प्रतीक्षा की थकान : ट्रैफिक में इंतजार, डॉक्टर की पंक्ति में अपनी बारी का इंतजार, पानी उबला कि नहीं, नौकरी मिलेगी तो कब, नया प्रोजेक्ट कैसे और कब पूरा होगा या घर में नन्हा मेहमान आने वाला है तो वह अब कितने माह बाद आने वाला है, यह जानने की उत्सुकता। दरअसल, हम हरदम होते हैं किसी न किसी चीज के इंतजार में और इस समय हर किसी के लिए सबसे बड़ा इंतजार है कोरोना वैक्सीन का, लेकिन इंतजार की अनिश्चित अवधि अक्सर पीड़ा देती है। यह लंबी होती जाए तो धैर्य खो देते हैं लोग। गुस्सा, कुंठा, एंजायटी का मिलाजुला प्रभाव थकाने लगता है।

इस संदर्भ में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक प्रो. राकेश कुमार पांडेय कहते हैं, ‘कुछ लोग दूसरा विकल्प चुनते हैं। गहरी सांस लेते हैं और संयत रहने की नियमित कोशिश करते हैं। ये लोग अपनी आशा को यथार्थ से जोड़कर रखते हैं।’ आपने देखा होगा कि किसी पंक्ति में खड़े लोग इंतजार करते हुए किसी रचनात्मक विकल्प में रम जाते हैं। जैसे फोन पर कुछ पढ़ने लग जाना या फिर सामने वाले व्यक्ति से बातचीत करना जो ध्यान हटाए। चूंकि आशावाद का दामन थामकर चलना आसान होता है, इसीलिए वे ऐसी रचनात्मक गतिविधियों को चुनते हैं। डॉ. आरती आनंद के अनुसार, ‘कुछ चीजें हमारे चाहने भर से नहीं हो सकतीं, यदि इस बात को हम स्वीकार कर लें, तो इंतजार परेशान नहीं करता। हमें यकीन होता है कि भले ही समय लगे, पर चीजें एक दिन पटरी पर जरूर लौटती हैं।’

सबसे कारगर है बिहेवियरल यानी व्यावहारिक वैक्सीन!

वाराणसी के बीएचयू के मनोविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार पांडेय ने बताया कि आप जिस कारगर वैक्सीन के लिए व्याकुल हो रहे हैं, चिंतित हो रहे हैं वैसा एक असरकारक वैक्सीन आपके पास पहले से ही है। यह है बिहेवियरल वैक्सीन। हमें खुद इसे बनाना है और इसे खुद को ही लगाना है। इसे वैक्सीन की डोज की तरह लेंगे तो यह न केवल संक्रमण का खतरा कम करेगा, बल्कि लगातार बढ़ रही एंजायटी यानी चिंता को भी घटाएगा। यह कोई नई चीज नहीं है।

बस वही है, जो जानकारी आपके पास पहले से है। आप जान रहे हैं कि इस समय कोरोना संक्रमण से बचने के लिए हमारा कैसा सजग व्यवहार होना चाहिए। जैसे कफ या खांसी के समय टिश्यू पेपर या रूमाल अपने पास रखें। हाथ धोना न भूलें, जिसे लोग इन दिनों काफी हद तक अनदेखा कर रहे हैं। साबुन से हाथ धोएं। बार-बार अपना चेहरा न छुएं। एक गलत आदत या व्यवहार, जो आपको छोटा लगे, लेकिन आपको बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। शारीरिक दूरी और मास्क सबसे बड़ा हथियार है, इसे भी आप अच्छी तरह जानते होंगे। इसके साथ-साथ अपनी मानसिक सेहत से कोई समझौता न हो, यह भी जरूरी है। योग, ध्यान को दिनचर्या में नियमित शामिल करना न भूलें। जो लोग इस समय योग की मदद ले रहे हैं, वे अपेक्षाकृत बेहतर हैं। आपको इस समय अपनी सेहत को पहली प्राथमिकता देनी चाहिए।

अपनी सतर्कता, सबकी सुरक्षा : यदि इन दिनों खबरों पर आपकी नजर बनी हुई है, तो यह जान रहे होंगे कि कोरोना वायरस की कई वैक्सीन पर अभी काम चल रहा है। ये खबरें राहत तो देती हैं पर यह भविष्य की बात है। अभी सुरक्षा के लिए जरूरी है कि हम सुरक्षा नियमों का सावधानी से पालन करें और अपना पूरा ख्याल रखें। यदि आप पूरी सजगता से ऐसा करते हैं तो आप संक्रमण बढ़ने की आशंका नगण्य कर देते हैं। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, वाराणसी के मनोविज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार पांडेय कहते हैं, ‘यह बीमारी फैल तो रही है, लेकिन इसकी वजह से मौत की दर बहुत कम देखने को मिली है। लेकिन लोग यदि इस तर्क को लेते हुए पर्याप्त सतर्कता नहीं बरत रहे तो जाहिर है वे खुद के साथ-साथ समाज की सुरक्षा को लेकर भी जागरूक नहीं। सकारात्मक रहना अच्छा है, लेकिन आप सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते।’ यह सवाल खुद से पूछिए कि आप सच के कितने करीब या दूर हैं।

इन तीन बातों पर खुद को करें एकाग्र

  • असहज करने वाले भावों को पहचानें। चाहें तो उन्हें लिख सकते हैं कि कैसे वे आपको असहज कर रहे हैं
  • समय पर सब होगा, यह बात खुद को याद दिलाते रहें। आप परेशान होते रहेंगे या फिर अपने दिन को बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे, इस बारे में निर्णय लें
  • वह काम करें, जो संतुष्टि का एहसास दिलाए। खुद में जितना यह एहसास होगा, आप ऊर्जावान बने रहेंगे

दिनचर्या को बनाएं रचनात्मक : नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आरती आनंद ने बताया कि हमारी खुशी में सबसे बड़ी बाधा कोई और नहीं, हम खुद बनते हैं। यदि आप हमेशा उन चीजों के बारे में सोचते हैं, जो नियंत्रण में नहीं तो यह जबरन आपको नकारात्मकता से भर देता है। रचनात्मक चीजों में हमारा मन नहीं लगता, न ही खुद का खयाल रखने में रुचि होती है। लगातार नकारात्मंक लोगों, परिवेश और खबरों के बीच बने रहें तो एंजायटी स्वाभाविक है।

कोशिश करें कि जो दिनचर्या लंबे समय से चली आ रही है, उसे जरूरी फेरबदल के साथ बनाए रखें। जैसे, अभी अनलॉक के बाद बाहर जाना बहुत जरूरी हो गया है तो अपनी दिनचर्या में सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए लोगों से मिलना-जुलना, बात करना भी शामिल करें। दिनचर्या में हर उस चीज को शामिल करें, जो आपको सुकून दे। याद रखें, नियमित दिनचर्या आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी।

बातचीत एंजायटी दूर करने का श्रेष्ठ जरिया! : हाल में दिल्ली के मैक्स अस्पताल, साकेत द्वारा कराए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि इन दिनों हर दूसरे भारतीय को एंजायटी हो रही है। इस अध्ययन के मुताबिक, तकरीबन 77 फीसद लोग बातचीत के माध्यम से अपनी एंजायटी को कम कर रहे हैं। 68 फीसद लोग अपने शौक को पूरा करने और 34 फीसद लोग मेडिटेशन करके एंजायटी दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।

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