जगदलपुर। बस्तर क्षेत्र में उत्पादित होने वाला कोसरा राइस अब मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन रहा है। मोटे धान की यह किस्म प्राकृतिक रूप से शुगर फ्री है। इसे मोटा अनाज मानकर लोग खाने से कतराते हैं। मल्टीनेशनल कंपनियां अब इस चावल को यहां के ग्रामीणों से करीब 25-30 स्र्पये किलो की दर से खरीद रही हैं और फिर एक किलो के पैकेट में पैक कर इसे बर्ड सीड के नाम से बाजार में 370 स्र्पये प्रति किलो की दर से बेचा जाता है। यह चावल लव बर्ड पालने के शौकीन चिड़ियों के दाने के लिए खरीद रहे हैं। 

विश्व प्रसिद्ध बैलाडीला पहाड़ का लौह अयस्क 70 पैसे प्रति किग्रा की दर से बेचा जा रहा है परन्तु इससे भी महंगे दर पर इसी पहाड़ की तराई में उपजने वाले कोसरा बिक रहा है। मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा लव बर्ड शीड के नाम पर इसे 370 स्र्पए दर से बेचा जा रहा है। इधर कोसरा उपजाने वाले करीब 25 गांव के किसानों को 30 स्र्पए पायली की दर से भुगतान किया जा रहा है। इसलिए तराई में अब कोसरा का उत्पादन तेजी से कम होता जा रहा हैं।

पहाड़ी ढलानों पर पारंपरिक तरीके से होती है खेती

बस्तर के ग्रामीण पारंपरिक रूप से पहाड़ी ढलानों पर कोसरा लगाते आ रहे हैं। दक्षिण बस्त्ार में बैलाडीला की तराई में बसे ग्राम बेंगपाल, कड़मपाल, मदाड़ी, पाड़ापुर, दुगेली, कलेपाल, कोड़ेनार आदि 25 गांवों के किसान करीब एक हजार एकड़ में कोसरा की फसल लेते हैं।

क्या है कोसरा

कुटकी को बस्तर में कोसरा कहा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम लिटिल मिलेट है। कृषि वैज्ञानिक एके ठाकुर बताते हैं कि जल्दी पकने वाली कुटकी को चिकमा और देर से पकने वाले को कोसरा कहते हैैं। इसमें आयरन अधिक होता है प्राकृतिक रूप से कैल्सियम और फाइबर की भी काफी होता है। वहीं इसमें कार्बोहाईड्रेटस का ग्लाइसिमिक इण्डेक्स जीआई कम होता है। कृषि अनुसंधान केंद्र कुम्हरावंड में करीब 10 साल तक इसमें शोध कार्य जारी है।

कम हो रहा उत्पादन

बैलाडीला क्षेत्र के किसान बताते हैं कि अब ढलान की उर्वरा शक्ति कम हो गई है। वे पेदा पद्धति से कोसरा की खेती करते रहे हैं परन्तु अब पहाड़ी की मिट्टी बह गई है और ढलान पथरीला हो गया है, इसलिए एक साल कोसरा तो दूसरे साल धान बोना पड़ता है। धान की तुलना में कोसरा का उत्पादन कम होता है, वहीं मेहनत अधिक लगता है। इसके बावजूद फसल का वाजिब दाम नहीं मिलता। पहले एक एकड़ में 10 बोरा तक कोसरा हो जाता था लेकिन अब पांच-छह बोरा ही रह गया है।

कम दर पर खरीदी

पटेलपारा कोड़ेनार के बोसे कड़ती, सुको, भीमा, मूसा, लक्ष्मण, लखमा, कोसा, नंदू मंडावी करीब 20 एकड़ में कोसरा उपजाते हैं। ये बताते हैं कि बचेली, किरंदुल, भांसी के दलाल उनसे 30 रूपए पायली की दर से खरीदते हैं। बताया गया कि एक पायली में करीब डेढ़ किलो कोसरा आता है। बचेली और किरंदुल के कुछ साहब शुगर फ्री बता कर 50 रूपए किलो की दर से कोसरा चावल खरीदकर ले जाते हैं। मेहनत के हिसाब से दाम नहीं मिल रहा, इसलिए उधर के किसान अब कोसरा छोड़कर जल्दी पकने वाला साठिया धान बोने लगे हैं।

लवर बर्ड शीड्स बना कोसरा

अपने घरों में लवर बर्ड पालने वाले पक्षी शौकीन इन्हे दाना के रूप में कोसरा खिलाते हैं। बाजार में कोसरा 100 स्र्पए किलो की दर से बिक रहा है। स्थानीय व्यापारी प्रणय जैन बताते हैं कि लवर बर्ड शीड कोलकाता से मंगवाना पड़ता है, इसलिए इसे सौ स्र्पए की दर से बेचा जा रहा है।

चाइना से आ रहा दाना

बताया गया कि बैलाडीला क्षेत्र के किसानों से खरीदा गया कोसरा कुछ दलाल कोलकाता भेजते हैं। वहां इसकी छनाई की जाती है। छोटा कोसरा चाइना भेजा जाता है। वहां इसकी चमक बढ़ा कर पैकेजिंग की जाती है और विटापाल नामक कंपनी लवर बर्ड शीड्स के नाम से बाजार में भेजती है। यह शीड 370 स्र्पए प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है।

सरकारी प्रयास नहीं

कृषि अनुसंधान केंद्र कुम्हरावंड के कृषि वैज्ञानिकों और उप संचालक कृषि कपिलदेव गौतम के प्रयास से बास्तानार क्षेत्र में कोसरा का रकबा करीब चार हजार एकड़ तक पहुंच गया है परन्तु बैलाडीला की पहाड़ी ढलान पर परम्परागत तरीके से कोसरा उपजाने वाले करीब 25 गांवों के किसानों को किसी भी तरह से प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है, इसलिए वहां के कोसरा उत्पादकों में हताशा है।

Posted By: Kamal Verma