नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। आज जिस 'वंदे मातरम' गीत को लेकर इतना विवाद हो रहा है, कभी वही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक राष्ट्रीय आंदोलन के तौर पर हथियार बन गया था। इस गीत की रचना बांग्ला के प्रख्यात उपन्यासकार एवं कवि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875-76 में बांग्ला और संस्कृत में की थी। बाद में सन 1885 में बंकिम चंद्र ने इस गीत को अपनी प्रसिद्ध कृति आनंदमठ में जोड़ दिया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 27 जून 1838 को बंगाल के उत्तर चौबीस परगना के कंथलपाड़ा, नैहाटी में एक बंगाली परिवार में हुआ था। आज उनकी 181वीं जयंती है। आइये इस खास मौके पर राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं पर नजर डालते हैं।

बंगाल के बंटवारे पर 'वंदे मातरम' के गूंज से बौखला गई थी अंग्रेजी हुकूमत
सन 1905 में अंग्रेजी हुकू मत की ओर से बंगाल के बंटवारे के एलान के खिलाफ एक भारी जनाक्रोश पनपा जिसमें इस गीत के मुखड़े ने एक हथियार का काम किया। अंग्रेजी हुक्मरानों के खिलाफ यह पूरे बंगाल में फैल गया। समूचे बंगाल ने एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की। हिंदू-मुसलमान सबने एक सुर में 'वंदे मातरम' का नारा बुलंद करते हुए अंग्रेजी हुक्मरानों की नींद हराम कर दी। इसी दौरान बारीसाल में किसान नेता एम रसूल की अध्यक्षता में बंगाल कांग्रेस का प्रांतीय अधिवेशन हो रहा था। अधिवेशन में 'वंदे मातरम' के गूंज से गुस्साई अंग्रेजी फौज ने नेताओं पर हमला बोल दिया। इस घटना ने आग में घी का काम किया नतीजतन यह नारा समूचे मुल्क में गूंजने लगा।

ब्रिटिश हुक्मरानों के नियम के बाद लिखा था वंदे मातरम
बंकिमचंद्र ने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से 1857 में बीए किया। यह वही साल था जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली बार भारतीयों ने संगठित विद्रोह किया था। बंकिमचंद्र प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए की डिग्री पाने वाले पहले भारतीय थे। साल 1869 में उन्होंने कानून की डिग्री ली जिसके बाद डिप्टी मजिस्ट्रेट पद पर नियुक्त हुए। कहा जाता है कि ब्रिटिश हुक्मरानों ने ब्रिटेन के गीत 'गॉड! सेव द क्वीन' को हर समारोह में गाना अनिवार्य कर दिया। इससे बंकिमचंद्र आहत थे। उन्होंने 1875-76 में एक गीत लिखा और उसका शीर्षक रखा 'वंदे मातरम'... बारीसाल में कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन के बाद साल 1905 में यह गीत वाराणसी में आयोजित कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में गाया गया। थोड़े ही समय में यह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारतीय क्रांति का प्रतीक बन गया।

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने बनाई थी धुन
बंकिमचंद्र का निधन 08 अप्रैल 1894 में हुआ था। उनके जीवनकाल में इस गीत को ज्यादा ख्याति नहीं हासिल हुई। लेकिन, इस सच्चाई को कभी नहीं झुठलाया जा सकता कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान जैसे प्रसिद्ध क्रांतिकारियों ने 'वंदे मातरम' गाते हुए ही फांसी का फंदा चूमा था। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इसकी खूबसूरत धुन बनाई थी। यही नहीं लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल ने भी 'वंदे मातरम' नाम से राष्ट्रवादी पत्रिकाएं निकाली थीं। जब आजाद भारत का नया संविधान लिखा जा रहा था तब इसे राष्ट्रगीत का दर्जा नहीं दिया गया था। हालांकि, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने ऐलान किया कि वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है। 

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Posted By: Krishna Bihari Singh

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