नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। Ayodhya Verdict : वर्ष 1989 में विहिप द्वारा अयोध्या में विवादित स्थल के पास किए गए राम मंदिर शिलान्यास से भाजपा और हिंदू संगठनों का उत्साह चरम पर था। इस उत्साह को भुनाने के लिए सितंबर 1990 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने श्रीराम रथ यात्रा का आयोजन किया। ये आइडिया भाजपा के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन ने दिया था। मकसद देशभर में लोगों को अयोध्या मूवमेंट के बारे में जागरूक करना और जोड़ना था। इस रथ यात्रा को लोगों का जबरदस्त साथ मिला। इसके बाद राम मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश में उठी लहर में दो वर्ष बाद 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा (बाबरी मस्जिद) गिरा दिया गया।

आडवाणी की श्रीराम रथ यात्रा

आडवाणी की रथ यात्रा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर गुजरात में सोमनाथ से 25 सितंबर 1990 को शुरू हुई और इसे मध्य भारत होते हुए अयोध्या तक पहुंचना था। ये रथ यात्रा हिंदुओं के लिए आस्था का विषय बन गया। रथ यात्रा जहां-जहां से गुजरती, लोग मंदिरों में घंटी बजाकर, थाली बजाकर और नारे लगाकर इसका स्वागत करते थे। कई जगहों पर लोग श्रद्धा स्वरूप आडवाणी के रथ का तिलक करते और रथ यात्रा की धूल माथे पर लगाते देखे गए।

चार राज्यों में दंगे के बाद गिरफ्तार हुए आडवाणी

हिंदुओं के इस उन्माद ने गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों का रूप ले लिया। लिहाजा, 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर जिले में पुलिस ने रथ यात्रा रोक दी। राज्य के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचने से पहले ही भाजपा की रथयात्रा समाप्त हो चुकी थी। बावजूद भाजपा की ये रथयात्रा कामयाब रही। वर्ष 1989 में भाजपा को जहां मात्र 85 सीटें मिली थीं, रथ यात्रा के बाद 1991 में हुए आम चुनाव में भाजपा ने 120 सीटें जीतीं।

1990 में दिखा था ढांचा विध्वंस का ट्रेलर

भाजपा की रथयात्रा से उत्साहित विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने वर्ष 1990 में भी अयोध्या में विवादित ढांचे को नुकसान पहुंचाया था। उस वक्त के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बातचीत के जरिए विवाद को सुलझाने का प्रयास भी किया, लेकिन असफल रहे। ये दो साल बाद होने वाले विवादित ढांचा विध्वंस का ट्रेलर था। राम मंदिर आंदोलन लगातार आगे बढ़ रहा था। 30 अक्टूबर 1992 को राम मंदिर मुद्दे पर दिल्ली के केशवपुरम में पांचवीं धर्म संसद आयोजित हुई। इसी धर्म संसद में तय हुआ कि 06 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कार सेवा आयोजित होगी। हिंदू संगठनों और विहिप के आव्हान पर देशभर से लाखों लोग व साधु-संत अयोध्या में एकत्र हुए। इसमें विहिप, शिव सेना और भाजपा के कार्यकर्ता भी काफी मात्रा में थे।

ढांचा गिरने के बाद हुए सांप्रदायिक दंगे

राम मंदिर निर्माण को लेकर हिंदुओं की आस्था पूरे ऊफान पर थी और इसी बीच भीड़ विवादित स्थल पर चढ़ गई। उस वक्त केंद्र में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार थी। इससे पहले की सरकार कोई कदम उठाती, भीड़ ने विवादित ढांचा गिरा दिया। विवादित ढांचा गिरते ही पूरे देश में इतिहास का सबसे बड़ा सांप्रदायिक दंगा भड़क गया। देशभर में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों ने 2000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। विदेशों तक में इस हिंसा की निंदा हुई। इस घटना से केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार बहुत ज्यादा दबाव में आ गयी। नतीजा ये हुआ कि 26 जनवरी 1993 को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने घोषणा कर दी कि उसी स्थान पर फिर से मस्जिद का निर्माण कराया जाएगा।

अयोध्या से ही जुड़ा है गोधरा दंगा

06 दिसंबर 1992 की घटना और उससे पहले व बाद में राम मंदिर निर्माण को देशभर में चले विभिन्न आंदोलनों ने भाजपा की राजनीतिक जमीन मजबूत कर दी। वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए अयोध्या समिति गठित की। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुस्लिम पक्षों से बात कर समझौते की रूपरेखा तैयार करने को कहा।

जब भाजपा ने चुवाी घोषणा पत्र से हटाया राम मंदिर मुद्दा

इसके बाद फरवरी 2002 के यूपी विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपने चुवावी घोषणा पत्र से राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को हटा दिया। हालांकि, विहिप ने 15 मार्च 2002 से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने की घोषणा कर दी थी। फलस्वरूप सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में एकत्र भी हुए। यहां से ट्रेन से वापस लौटते वक्त गुजरात के गोधरा में 58 हिंदुओं की संदिग्ध परिस्थिति में ट्रेन में आग लगने से मौत हो गई थी, जिसने बाद में गोधरा दंगों का रूप ले लिया था। ट्रेन में आग एक बड़ी साजिशका हिस्सा मानी जाती है।

लाखों कार सेवकों के खिलाफ हुई एफआईआर

विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद यूपी पुलिस ने मामले में लाखों कार सेवकों समेत कुछ नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। मामले की जांच पहले सीआईडी और फिर क्राइम ब्रांच ने की। सीआईडी ने फरवरी 1993 में आठ आरोपियों के लिखाफ ललितपुर की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। इस केस में कई दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं। बाद में इस केस को लखनऊ ट्रांसफर कर दिया गया था।

केस के 12 आरोपियों व 55 गवाह की हो चुकी है मौत

मई 2003 में सीबीआई ने मामले में लालकृष्ण आडवाणी समेत 13 लोगों के खिलाफ पूरक आरोप पत्र दायर किया था। हालांकि, लालकृष्ण आडवाणी को कोर्ट ने बरी कर दिया था। 06 जुलाई 2005 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में लालकृष्ण आडवाणी का नाम आरोपियों में दोबारा शामिल करने का आदेश दिया। बताया जाता है कि इस केस में कुल 49 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इसमें से 12 लोगों की केस की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। केस से जुड़े 55 गवाहों की भी मौत हो चुकी है। इस केस में अब तक किसी को सजा नहीं हुई है।

Posted By: Amit Singh

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