नई दिल्ली, अंशु सिंह। पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर रहे, बेंगलुरु के आनंद मल्लिगावाद को देश में बढ़ते जल संकट और झीलों की दुर्दशा ने इतना विचलित कर दिया कि वे नौकरी छोड़, तालाबों को पुनर्जीवन देने के अपने बड़े मकसद को पूरा करने में जुट गए। इन्होंने शहर को उसका पहला 'फ्रीडम लेक'दिया। 36 एकड़ में फैले कयालासनाहल्ली झील पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा था। आनंद से उसे मुक्त कराकर, उसे नया जीवन दिया। आज वे बेंगलुरु की करीब 130 लेक कम्युनिटी से जुड़कर उन्हें तकनीकी सहयोग प्रदान करते हैं। कर्नाटक सरकार ने इन्हें अपनी जलामृत नामक कम्युनिटी की तकनीकी कमेटी में शामिल किया है। बकौल आनंद, इनका लक्ष्य 2025 तक 45 झीलों को पुनर्जीवित करना है।

आनंद बताते हैं, देश की 'सिलिकन सिटी' बेंगलुरु में देश भर से युवा नौकरी व अच्छे भविष्य के लिए आते हैं। यहां की शिक्षा व्यवस्था और खुशनुमा मौसम देखकर बिहार, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु जैसे दूसरे प्रदेशों से भी लोग आकर बस रहे हैं। आसपास के इलाकों से भी नौजवान यहां आते हैं, जिन्हें गांव में रोजगार, खेती के लिए पानी नहीं मिलती। लेकिन सोचिए वही स्थिति अगर बेंगलुरु में पैदा हो जाए,तो सभी कहां जाएंगे? कैसे जीएंगे पानी के बिना? जैसा कि सबको पता है कि समुद्र तल से 3000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है बेंगलुरु। एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के बाद केप टाउन की तरह यह भी एक सूखाग्रस्त शहर हो जाएगा। इस एक खयाल से ही मैं चिंतित हो गया। आप कह सकते हैं कि प्रेरणा की बजाय डर से शुरू किया यह अभियान। दरअसल, 1996 में मैं जब यहां आया था, तो 15 फीट की खुदाई के बाद पांच फीट तक बिल्कुल साफ पानी मिलता था। शहर के अंदर पानी की प्रचुरता थी। लेकिन आज 1000 फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं मिल रहा है। जो मिल रहा है, वह पीने लायक नहीं रह गया है। तीन लीटर पानी फेंकेंगे, तो एक लीटर मिलेगा। झीलें खत्म हो रही हैं सो अलग। मैंने सोचा कि इस स्थिति से कैसे बचा जाए और एक्टिविज्म की ओर कदम बढ़ गए।

एक साल किया शोध

मैं बेंगलुरु से करीब साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर एक गांव से ताल्लुक रखता हूं। वहीं के सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जो एक तालाब के किनारे था। अक्सर उसके समीप मिïट्टी में खेलता, पेड़ों पर चढ़़ता, पानी में मछली, मेंढक, सांप को देखा करता। कह सकते हैं कि स्कूल से अधिक पढ़ाई उस झील के किनारे ही हुई। इसलिए मुझे मालूम है कि झील क्या होती है। हां, जो बीड़ा उठाया था, वह मुश्किल था, लेकिन नामुमकिन नहीं। झीलों के पुनरुद्धार के लिए बायोडाइवर्सिटी, इकोलॉजी, मिट्टी, हाइड्रोलॉजी, जियोलॉजी जैसे विषयों की जानकारी होनी चाहिए, जो मेरे पास नहीं थी। न ही कंसल्टेंट को लाखों रुपये की फीस दे सकता था, क्योंकि अमूमन इन सारी जानकारियों व कार्यों के लिए सरकारें या कंपनियां कंसल्टेंट रखती हैं। इतना ही नहीं, झील से मिट्टी निकालने के लिए भी लाखों खर्च करने पड़ते हैं, क्योंकि यह पूरा काम व्यावसायिक तरीके से होता है। मैं यह सब नहीं कर सकता था। इसलिए झीलों पर काम शुरू करने से पहले मैंने करीब एक साल (2016-17) शोध व अध्ययन किया। 180 से अधिक झीलों का दौरा व निरीक्षण किया। उनकी स्थिति, आसपास के क्षेत्र, मिट्टी की स्थिति, पुराने विशेषज्ञों द्वारा कराए गए कार्यों आदि को देखा। पानी के शुद्धिकरण के लिए क्या उपाय किए गए हैं, उनकी जानकारी हासिल की।

कयालासनाहल्ली झील का पुनरुद्धार

मैं लोगों में व्याप्त भ्रम को तोडऩा चाहता था कि झील बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं,सालों का समय लगता है,राजनीतिक रसूक, सरकार में पहुंच चाहिए होती है आदि-आदि। कयालासनाहल्ली झील 36 एकड़ में फैली एक विशाल झील थी, जिसके एक हिस्से पर किसानों का अतिक्रमण था, तो कुछ हिस्सा बच्चों का क्रिकेट ग्राउंड और शेष भूमि उद्योगों का डंपिंग ग्राउंड बनी हुई थी, जिसमें हर तरह का कचरा डंप किया जाता था। मुझे लगा कि अगर इन सारी चुनौतियों को दूर कर झील को पुनर्जीवित करता हूं, तो समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। इस तरह, मैंने सभी बातों को दरकिनार कर इस झील को नया जीवन देने का कार्य प्रारंभ किया। अपनी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की, कि वे सीएसआर के तहत प्रोजेक्ट में मदद करें। पहले तो उन्हें थोड़ी शंका हुई कि मैं अकेले कैसे सब करूंगा, कहीं कोई लिटिगेशन हो गया। लेकिन जब उन्हें समझाया कि अगर कोई काम ईमानदारी से किया जाता है, तो प्रकृति के पांचों तत्व स्वयं मददगार बन जाते हैं। अंत में वे राजी हो गए और सनसेरा फाउंडेशन की ओर से 17 लाख रुपये दिए। इसके बाद मैं झील विकास प्राधिकरण समेत अन्य सरकारी अधिकारियों से मिला और उन्हें बताया कि एक झील बना रहा हूं, जिसके लिए उनसे सहयोग की अपेक्षा है। उन्होंने भी कुछ बातचीत के बाद हामी भर दी।

45 दिनों में तैयार हुआ फ्रीडम लेक

मैंने अप्रैल 2017 में कयालासनाहल्ली झील पर काम करना शुरू किया था। इसमें 20 मजदूरों, कुछ मशीनों, वॉलंटियर्स और स्थानीय लोगों-किसानों का सहयोग रहा। पहले हमने झील के 12 एकड़ से किसानों का अतिक्रमण हटाया। दस एकड़ के डंपिंग ग्राउंड को साफ कराया, चार लाख 60 हजार क्यूबिक मीटर मिट्टी निकलवाया, उसमें 23 फीट पानी रोकने के लिए जगह और करीब में साढ़े तीन किलोमीटर लंबा बांध बनाया। इतना ही नहीं, जो मिट्टी निकली, उससे इसमें पांच द्वीप बनाए गए और मियावाकी तकनीक से 5600 पौधे लगाए गए। मियावाकी एक जापानी तकनीक है, जिससे एक जंगल 10 गुना तेजी से वृद्धि पाता है। दक्षिण भारत में सबसे बड़ा मियावाकी जंगल इसी झील में है। वृक्षारोपण के इस कार्य में आइटी प्रोफेशनल्स ने वॉलंटियर किया। इस तरह, बिना किसी शोर-शराबे के 45 दिनों में विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) तक यह झील तैयार हो गई थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर झील की तस्वीरें वायरल होने लगीं।

प्रमुख समाचार पत्रों व चैनलों ने सकारात्मक रिपोर्ट की, कि कैसे एक झील शहरवासियों के लिए मिसाल बन गई। इसके बाद,15 अगस्त को मैंने 400 से अधिक स्कूली बच्चों के साथ यहां तिरंगा फहराया और इसे शहर के पहले 'फ्रीडम लेक' का नाम दिया गया। बच्चों ने इस दिन एक शपथ भी ली कि वे बड़े होने पर झील के साथ यहां लगे पौधों की जिम्मेदारी उठाएंगे। उनकी देखभाल करेंगे। इस तरह, आज बेंगलुरु के 300 झीलों में से यह एकमात्र झील है जिसका पानी पीने के लायक है। इस झील में स्टील,कंक्रीट कोई आधुनिक मैटीरियल का इस्तेमाल नहीं हुआ है। पौधों से ही इसकी फेंसिंग हुई है। इसमें 65 से अधिक किस्म के जलीय पौधे लगाए गए हैं, जो किसी नर्सरी से नहीं खरीदे गए, बल्कि किसानों व जानकारों के सहयोग से लगाए गए हैं। आज किसान यहां के फलदार पेड़ों से भी अच्छी कमाई कर रहे हैं। उनका जीवन बदल गया है। इससे समाज में भी संदेश गया कि इंसान अगर चाह ले, तो क्या नहीं कर सकता है। झील के निर्माण में कुल एक करोड़ 17 लाख रुपये खर्च हुए।

'डेडली' लेक को जीवनदान

कयालासनाहल्ली झील के बाद मेरे पास एचपी कंपनी की ओर से वाबासेंद्र झील के पुनरुद्धार का प्रस्ताव आया। मैंने 95 लाख रुपये और 55 दिनों में 9 एकड़ की इस झील का कार्य भी पूरा कर दिखाया। वहां एक मियावाकी जंगल और डेढ़ किलोमीटर लंबा बांध भी बना दिया। इसके बाद सरकार और अन्य लोग एलर्ट हो गए। उन्हें लगा कि मेरे पास कोई तकनीक है, जिससे कम खर्च और समय में झील तैयार हो जाती है। कुछ लोगों को तो इसमें जादू भी नजर आता था। वहीं, कुछ पागल समझते थे। मेरी ईमानदारी पर भरोसा नहीं होता था कि अपना पैसा लगाकर भी कोई इस तरह का काम कर सकता है। लेकिन इसी बीच, 2018 के सितंबर महीने में कुछ लोग मेरे पास कोनसंद्र झील को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव लेकर आए। 16 एकड़ की यह झील बेलंदूर से भी अधिक प्रदूषित हो चुकी थी। इसे 'डेडली लेक' कहा जाने लगा था, क्योंकि कई कंपनियों का रासायनिक कचरा इस झील में जमा हो रहा था।

जब मीडिया में इसकी खबरें आईं, गांव वालों ने विरोध प्रदर्शन किया, तो कर्नाटक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 21 कंपनियों को नोटिस तक थमा दिया। इसके बाद कंपनियों ने झील को प्रदूषण मुक्त कराने की पेशकेश की। लेकिन किसानों को उन पर भरोसा नहीं था। उन्होंने मांग की कि जिसने कयालासनाहल्ली झील बनाई है, उसे लेकर आओ। तब जाकर मेरे पास कुछ लोग प्रस्ताव लेकर आए। मैंने स्पष्ट कह दिया कि मुझे कोई रकम नहीं चाहिए। वे सीधे उन्हें भुगतान कर दें, जो यहां काम करेंगे, क्योंकि मेरा कोई एनजीओ या कोई संस्था नहीं है। लोग हैरान थे कि इतनी कम राशि में कैसे झील तैयार हो गई, जबकि कुछ लोगों ने साढ़े करोड़ रुपये में इसे बनाने का प्रस्ताव दिया था। वही काम मैंने 65 दिनों में साढ़े चार एकड़ के अतिक्रमण को हटाते हुए, 81 लाख रुपये की लागत से कर दिखाया। इसी प्रकार, ग्लोबल क्राउड फंडिंग संस्था मिलाप के प्लेटफॉर्म के जरिये मिले 17 लाख रुपये से हमने गवी लेक को भी पुनजीर्वित किया। उसमें जलशुद्धीकरण करने वाले पौधे लगाए।

नौकरी छोड़ मिशन पर जुटे

तीन झील बनाने के बाद मैंने नौकरी छोडऩे का मन बना लिया था। लेकिन बेंगलुरु की जिस कंपनी में सीएसआर प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रहा था, वह मुझे छोडऩे को राजी नहीं थी। प्रबंधन का कहना था कि जब मैं नौकरी में रहकर ये सब कर सकता हूं, तो आगे भी कर लूंगा। लेकिन मैंने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि मैंने सोचा कि जब कुछ सालों में 17-18 घंटे काम करने के बाद इतने लोगों की जिन्दगी बदल सकती है,तो नौकरी छोडऩे के बाद कितना समय और मिल जाएगा। कितना और झीलों को जीवन मिल जाएगा। कंपनी ने मुझे बहुत रोकने की कोशिश की। पूछा कि परिवार का भरण-पोषण कैसे करूंगा। लेकिन मेरा इरादा पक्का हो चुका था। दरअसल, मैं अब आखिरी दम तक यही करना चाहता हूं। 16 साल की नौकरी में जो भी जमा किया था, उसे सरकारी बैंक में जमा कर दिया है। इससे बेटी की पढ़ाई और अगले छह साल का जीवन यापन हो जाएगा। मेरा लक्ष्य 2025 तक 45 झीलों को पुनर्जीवित करना है। इसके लिए यूनिवर्सिटी के साथ टाइ अप किया है। वहां के आर्किटेक्चर, सिविल, कंप्यूटर साइंस एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग झीलों की डिजाइन तैयार करेंगे।

लेक रिवाइवर्स ग्रुप का गठन

मैंने 'सेव लेक्स डॉट कॉम' प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जिसपर झीलों के पुनरुद्धार से संबंधित ब्लॉग्स, तस्वीरें और वीडियोज साझा की जाती हैं। इससे देश-दुनिया के लोगों से जुडऩे का अवसर मिलता है। हमने 'लेक रिवाइवर्स कलेक्टिव' नाम से एक भी बनाया है, जिसका उद्देश्य भारत भर के झीलों को पुनजीर्वित एवं संरक्षित करना है। इसके तहत 22 शहरों की पहचान की गई है, जहां ग्रुप के प्रतिनिधि कार्य कर रहे हैं। मेरे पास दिल्ली, चंडीगढ़, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश जैसे राज्यों से भी प्रस्ताव आ रहे हैं। मैं जो कर सकता हूं, वह करूंगा, क्योंकि यह मेरी देश के प्रति एक सेवा होगी। झीलों के पुनरुद्धार के अलावा मेरी योजना 35 लाख पेड़ लगाने और दुनिया भर में साढ़े चार लाख लोगों को झील निर्माण के कार्य में प्रशिक्षित करने की है। इस काम की शुरुआत हो चुकी है। दो बैच को प्रशिक्षित किया जा चुका है। मैं शैक्षिक संस्थाओं, कॉरपोरेट्स, विभिन्न समुदायों के बीच जा रहा हूं, उन्हें प्रेरित करने का प्रयास कर रहा हूं कि वे आगे आएं। इस समय करीब 25 सॉफ्टवेयर कंपनियों ने सीएसआर के तहत सहयोग का हाथ बढ़ाया है। मैं मानता हूं कि एक किसान का बेटा होकर इतना कुछ कर सकता हूं, तो देश के नौजवान क्यों नहीं कर सकते?

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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