सुजाता शिवेन। कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने देश में स्त्री सशक्तीकरण के लिए इतने कार्य किए कि अगर उनके योगदान को ठीक से रेखांकित किया जाए तो वह किसी भी सिमोन द बोउआ और जर्मेन ग्रीयर से कम नहीं दिखाई देती हैं। कमलादेवी को देश की सामाजिक स्थितियों का अच्छी तरह भान था। इसीलिए वह महिलाओं को पुरुषों से अपने अधिकारों के लिए लड़ाई करने की पैरोकारी नहीं करती थीं, बल्कि वह चाहती थीं कि महिलाएं ऐसा काम करें कि पुरुष उनको सम्मान की नजरों से देखें और अपने बराबर मानें। वह महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक जगत में उन्नति के लिए तैयार करने की पक्षधर थीं। कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने इस दिशा में अनेक कार्य किए जो महिला अधिकारों के लिए आधार बनीं।

कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लेना आरंभ किया। गांधी वर्ष 1930 के आसपास स्वाधीनता आंदोलन के सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित हो गए थे। उनके साथ तर्क करने का साहस बहुत कम लोग ही जुटा पाते थे, लेकिन कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने न केवल गांधी के साथ लंबा तर्क-वितर्क किया, बल्कि उनको महिलाओं का साथ देने के लिए राजी भी कर लिया। सविनय अवज्ञा आंदोलन का दौर था और गांधी ने नमक सत्याग्रह के लिए दांडी मार्च का आह्वान किया था। जब कमलादेवी चट्टोपाध्याय को पता चला कि बापू ने नमक सत्याग्रह के दौरान महिलाओं से इस सत्याग्रह में भाग लेने की अपील नहीं की तो वह बेहद क्षुब्ध हुईं। इस संबंध में उन्होंने बापू से लंबा संवाद किया और आखिरकार उनको इस बात के लिए तैयार कर लिया गांधी नमक सत्याग्रह में महिलाओं से भी भाग लेने के लिए अपील करें।

कमलादेवी ने एक महिला के साथ बांबे में (अब मुंबई) नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था। उस समय का नमक कानून तोड़ा और उनको जेल की सजा भी हुई। इसका असर पूरे देश की महिलाओं के मानस पर पड़ा। उनके अंदर एक विश्वास जगा कि वे भी अपने पुरुष साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वाधीनता के आंदोलन में हिस्सा ले सकती हैं।

दरअसल कमलादेवी चट्टोपाध्याय जब अपने ननिहाल में रह रही थीं तो उनको गोपालकृष्ण गोखले, एनी बेसेंट, तेज बहादुर सप्रू, श्रीनिवास शास्त्री आदि का न केवल सान्निध्य मिला, बल्कि उनके बीच होने वाली बातों को सुनकर वह समृद्ध भी हुईं। इन सबकी बातें सुनकर कमलादेवी चट्टोपाध्याय के अंदर एक तर्कवादी व्यक्तित्व का विकास हुआ। कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महिलाओं को संगठित करने का काम किया। वर्ष 1923 में कमलादेवी सेवादल में शामिल हो गईं और कुछ ही महीनों के बाद उनको सेवादल में महिला कार्यकर्ताओं का प्रभारी बना दिया गया। इस संगठन में रहते हुए उन्होंने पूरे देश का भ्रमण करते हुए सेवादल में सेविकाओं को शामिल करवाया। इससे सेवादल में महिलाओं की प्रमुख भूमिका होने लगी थी।

इस बीच उनकी मुलाकात मार्गरेट कजिंस से हुई जिन्होंने आल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस की स्थापना की थी। समय के साथ कमलादेवी इस संस्था की संगठन सचिव बनीं और कुछ ही सालों में इस संस्था की अध्यक्ष भी बनीं। वर्ष 1932 में जब दिल्ली में लेडी इरविन कालेज की स्थापना हुई तो कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने इसमें बेहद सक्रिय भूमिका निभाई। कमलादेवी ने महिलाओं की शिक्षा और उनके स्वावलंबन को लेकर भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इसी कड़ी में उन्होंने भारतीय हस्तशिल्प, हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए कई संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने पूरे देश में घूम-घूमकर थिएटर को भी बढ़ावा दिया।

कमलादेवी का जन्म वर्ष 1903 में मंगलुरू में हुआ था। जब उनके पिता का निधन हुआ तब उनकी उम्र बहुत अधिक नहीं थी। जब वह 14 साल की हुईं तो उनका विवाह कर दिया गया, लेकिन दो साल में ही उनके पति की मृत्यु हो गई। उस समय विधवा विवाह के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। वह पढ़ाई के लिए मद्रास (अब चेन्नई) के क्वीन मेरी कालेज पहुंचीं। वहां उनकी मुलाकात सरोजिनी नायडू की बहन सुहासिनी चट्टोपाध्याय से हुई और दोनों में मित्रता हो गई। इस मित्रता की वजह से ही वह सुहासिनी के भाई हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के संपर्क में आईं, जो कलाकार थे।

कला में कमलादेवी की रुचि दोनों को करीब ले आई और कमलादेवी ने उनसे विवाह का निर्णय लिया। उस वक्त मद्रास के रूढि़वादियों ने विधवा विवाह को लेकर बहुत हल्ला-गुल्ला मचाया था, लेकिन कमलादेवी अपने निर्णय पर अडिग रहीं और उन्होंने हरिन्द्रनाथ से विवाह कर लिया। बाद में कमलादेवी ने एक और निर्णय लिया जिसके बारे में तब सोचा भी नहीं जा सकता था। जब उनकी हरिन्द्रनाथ से नहीं बनी तो उन्होंने उनसे तलाक ले लिया। इस बीच उन्होंने मद्रास से विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। विधानसभा चुनाव लड़ने वाली वह भारत की पहली महिला उम्मीदवार बनीं। हालांकि वह चुनाव हार गईं, लेकिन उन्होंने महिलाओं के संसदीय राजनीति में आने की राह बना दी।

कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने स्वाधीनता के बाद भी महिलाओं को स्वावलंबी बनाने की दिशा में कई कार्य किए और कई संस्थाओं की स्थापना की। हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए भी उन्होंने क्राफ्ट काउंसिल, हैंडीक्राफ्ट बोर्ड जैसी संस्थाओं की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके माध्यम से वह महिलाओं को रोजगार दिलाने का कार्यक्रम चलाती थीं। कला, शिक्षा और महिलाओं के स्वावलंबन के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उनको पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया। वर्ष 1988 में उनका निधन हो गया।

Edited By: Neel Rajput