जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि धर्म के मूल में अर्थ है। धन नहीं है तो धर्म भी कमजोर पड़ सकता है। इसको ही आधार बनाकर कहा जा सकता है कि अगर किसी भाषा को बोलनेवाले के पास अर्थ या धन न हो तो भाषा कमजोर पड़ जाती है। हिंदी की भी स्थिति इस वजह से ही थोड़ी कमजोर है। ये कहना है नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक और लेखक अमीश त्रिपाठी का जो दैनिक जागरण के मंच ‘हिंदी हैं हम’ पर बोल रहे थे। अमीश ने कहा कि जैसे जैसे हिंदी प्रदेशों की आर्थिक उन्नति होगी वैसे वैसे हिंदी की भी उन्नति होगी। ये बहुत ही स्वाभाविक तरीके से होगा। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और हरियाणा समृद्ध होंगे , हिंदी उसके साथ साथ समृद्ध होगी।

अमीश ने मुताबिक पूरी दुनिया में अंग्रेजी का बोलबाला है। यूरोप जाएंगें तो फ्रांस, इटली और जर्मनी में भी अंग्रेजी में काम होता है। फ्रांस के लोगों के बारे में कहा जाषू सेंटर, लंदन के निदेता है कि वो अपनी भाषा पर बहुत अभिमान करते हैं लेकिन वहां भी कंपनियों में कामकाज अंग्रेजी में करने की मजबूरी है। अंतराष्ट्रीय बाजार जिस भाषा में संवाद करता है उस भाषा में काम करना पड़ता है। सूचना प्रोद्योगिकी की भाषा अंग्रेजी है लिहाजाअंग्रेजी को अपनाना पड़ता है। अमेरिका और ब्रिटेन से व्यापार करने और इनके प्रभाव के कारण लोगों को अंग्रेजी सीखनी पड़ती है। हिंदी का इतना बड़ा बाजार नहीं है इस वजह से हिंदी की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है।

अमीश त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी प्रदेशों में रहनेवाले उच्चवर्ग को हिंदी की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये देखकर दुख होता है कि हिंदी भाषी प्रदेश का जो अभिजात्य वर्ग है उसको अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व नहीं है। वो हिंदी में बातचीत को या हिंदी भाषा में पुस्तकें पढ़ने को प्राथमिकता नहीं देते हैं। अगर आप बंगाल जाएं, महाराष्ट्र, तमिलनाडु या केरल जाएं तो आपको वहां का अभिजात्य वर्ग अपनी मातृभाषा को लेकर बेहद सचेत नजर आएगा। कोई मराठी अंग्रेजी में बात करता है तो वो मराठी को भी उतनी ही तवज्जो देता है। हिंदी भाषी राज्यों के अभिजात्य वर्ग में ऐसा देखने को नहीं मिलता है। इस वजह से भी हिंदी की स्थिति बेहतर नहीं हो पाती है। समाज का अभिजात्य वर्ग जिस भाषा को अपनाता है उसका असर समाज के दूसरे वर्गों पर भी पड़ता है।

अमीश ने एक बार फिर से अर्थव्यवस्था और ग्राहकों की क्रयशक्ति को भाषा की ताकत से जोड़ा। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता के बाद केरल के लोग मध्यपूर्व के देशों में गए और वहां से उन्होंने पैसे कमाकर घर भेजने आरंभ किए। केरल के लोग समृद्ध होने लगे। असर ये हुआ कि वहां के लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी । वो अन्य चीजों के साथ मलयाली भाषा की पुस्तकें खरीदने लगे। भाषा भी बेहतर स्थिति में चली गई। इस तरह से आप देख सकते हैं कि आर्थिक शक्ति का प्रभाव बहुत दूर और देर तक पड़ता है। विकास का असर भी भाषा पर पड़ता है। इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि काशी विश्वनाथ धाम के नव्य स्वरूप की वजह से काशी में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी है। इससे शहर समृद्ध होगा। इस समृद्धि का असर भी भाषा की समृद्धि पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि पहले शिवरात्रि पर ढाई लाख लोग दर्शन करने के लिए काशी पहुंचते थे अब आम दिनों में पांच लाख श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

अमीश ने स्पष्ट किया कि वो अंग्रेजी के विरोधी नहीं हैं लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री विदेश जाकर हिंदी में बात करते हैं तो उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक बहुत शानदार भाषण अंग्रेजी में दिया। अमीश ने प्रश्न उठाया कि वो भाषण किसके लिए दिया गया था। उस समय एक प्रतिशत आबादी भी उस भाषण को समझ नहीं पाई होगी। अमीश का कहना था कि जब देश का प्रधानमंत्री देश की भाषा में बात करता है तो मन को बहुत अच्छा लगता है। गर्व होता है कि हमारा प्रधानमंत्री अपनी भाषा में बात कर रहा है। हमें अपनी भाषा पर अभिमान करना चाहिए, हम किसी विदेशी भाषा के रंग में क्यों रंगे। हमारा जो रंग है उसको ही लेकर चलना चाहिए। भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं है वो संस्कृति को साथ लेकर चलती है। हर भाषा का एक संस्कर होता है जो उसके शब्दों में प्रतिबिंबित होती है।

गौरतलब है कि ‘हिंदी हैं हम’ दैनिक जागरण का अपनी भाषा हिंदी को समृद्ध करने का एक उपक्रम है। इसके अंतर्गत ही 9 जनवरी से लेकर 15 जनवरी विश्व हिंदी सप्ताह का आयोजन किया गया था। जिसके अंतर्गत पूरी दुनिया के हिंदी के विद्वानों, लेखकों, कवियों, राजनयिकों से बातचीत की जा रही थी। नेहरू सेंटर के निदेशक अमीश त्रिपाठी से संवाद के साथ सप्ताह भर से चल रहे इस कार्यक्रम का समापन हो गया।