नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। कहते हैं धरती का 70 फीसद हिस्सा पानी से ढका हुआ है। इसके बावजूद धरती पर मौजूद ज्यादातर पानी पीने योग्य नहीं है। यह तो हम सब जानते ही हैं कि जीवन के लिए पानी कितना महत्वपूर्ण है। कहा भी जाता है- 'जल ही जीवन है।' गर्मी धीरे-धीरे अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर रही है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी, वैसे-वैसे देश के विभिन्न कोनों से पानी की किल्लत की खबरें भी सुर्खियां बनने लगेंगी। कहीं सूखे तलाब और कुंए प्राइम टाइम में दिखेंगे तो कहीं सरकारों के आम लोगों तक पानी नहीं पहुंचा पाने पर बहस व चर्चाएं होगी। दुखद बात यह है कि पानी बचाने के लिए हम सब अपनी ओर से बहुत कम प्रयास करते हैं। लेकिन एक शख्स है जिसने अपना पूरा जीवन जल संरक्षण के नाम कर दिया है। उस शख्स के बारे में भी बात करेंगे, पहले जान लेते हैं अभी कैसे हैं देश के हालात...

गर्मियों का मौसम दस्तक दे चुका है और पानी की समस्या अभी से ही विकराल रूप धारण करने लगी है। पिछले साल का दर्द अभी से डराने लगा है। आपको तो याद ही होगा पिछले साल महाराष्ट्र में विदर्भ के कुछ इलाकों में जल संकट से निपटने के लिए रेल के जरिए पानी पहुंचाना पड़ा था। देश के विभिन्न कोनों से पानी के लिए तरसते लोगों की खबरें भी सुर्खियों में छाई रही थीं। जानकारों का मानना है कि पिछला मानसून अच्छा रहा था, इसके बावजूद इस बार फिर गर्मियों में पानी की किल्लत परेशान करेगी।

जल जागरण: आप कितने पानी में हैं?

10 करोड़ लोग साफ पानी को महताज
पानी की कमी इकलौती समस्या नहीं है। देश में लोगों को जहां पानी मिलता भी है वहां भी जरूरी नहीं कि वह पीने योग्य साफ पानी ही हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो भारत में 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। कई शहरी इलाकों में ही लोग गंदा और बदबूदार पानी पीने को मजबूर हैं, गांवों की स्थिति तो और भी खराब है। भारत को गांवों का देश भी कहा जाता है और कहते हैं कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। देश की इसी आत्मा के लगभग 70 फीसद लोग अब भी प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है।

18 फीसद जनता के पास सिर्फ 4 फीसद पानी
भारत एक बहुत बड़ा देश है और क्षेत्रफल के लिहाज से यह दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश है। जबकि जनसंख्या की बात करें तो चीन के बाद भारत का नंबर दूसरा है। इस देश में सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या निवास करती है और यह तेजी से बढ़ भी रही है। यानी दुनिया की कुल आबादी की 18 फीसद जनसंख्या भारत में निवास करती है, लेकिन दुनिया में उपलब्ध कुल पीने योग्य पानी का यहां 4 फीसद ही उपलब्ध है। यह आंकड़े हमारे नहीं केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर और चिंतनीय है। सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले करीब 1 दशक में प्रति व्यक्ति पानी उपलब्धता तेजी से घटी है।

न हम गंभीर न सरकारें...
जल संरक्षण के प्रति न तो हम खुद जिम्मेदार हैं न सरकारें गंभीर दिखती हैं। पानी बचाने और उसके सही वितरण की पूरी जिम्मेदारी सरकार पर छोड़ना भी ठीक नहीं है। इसके लिए हम सभी को प्रयास करने चाहिए। हमें पानी का बेहतर इस्तेमाल सीखना होगा। हमें सीखना होगा कि कैसे पानी को कम से कम बर्बाद किया जाए और कैसे पानी के प्राकृतिक स्रोतों को जिंदा रखा जाए। हमें पानी के सबसे बड़े स्रोत यानी बारिश के पानी का संचय करना भी सीखना होगा। यह सब हमारी ही जिम्मेदारी है, इसके लिए हम सरकारों को दोषी नहीं ठहरा सकते। पानी बचाने की सरकारी कोशिश का ही अगर हम सही तरह से समर्थन कर दें तो भी जल संरक्षण के प्रति हम अपनी जिम्मेदारियां निभा सकते हैं।

जल पुरुष कहलाने लगा यह शख्स

लोगों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने और जल संरक्षण को लेकर सरकारें अब गंभीर होने लगी हैं। जल संरक्षण की बातें अब लगभग हर सरकार के लिए अहम हो गई हैं। लेकिन एक व्यक्ति हैं, जो संभवत: भविष्य को पहले ही देख चुका था। वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि जल पुरुष कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह हैं। पानी की जो समस्या आज दुनिया के सामने दिख रही है उसे राजेंद्र सिंह पहले ही समझ चुके थे। यही कारण है कि वे जल संरक्षण के काम में बहुत पहले से जुट गए थे। इस जल संकट की आहट को उन्होंने पहले ही सुन लिया था और इस ओर उनके कदम बढ़े तो यह प्रयास जल संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित हुए।

बागपत में जन्मे और राजस्थान बनी कर्म भूमि
राजेंद्र सिंह का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में हुआ था। बागपत यमुना नदी के किनारे बसा है और उनके पिता एक जमीदार थे। उनके पास लगभग 60 एकड़ जमीन भी थी। राजेंद्र सिंह अपने सात भाइयों में सबसे बड़े थे, इसलिए पिता के बाद घर के मुखिया की जिम्मेदारी भी उन्हें ही संभालनी थी। लेकिन उन्होंने तो कुछ ऐसा करने की ठान रखी थी, जिसका उनकी जमीन-जायदाद का कुछ लेना-देना नहीं था। उन्होंने समाजसेवा को ही अपने लिए बेहतर समझा। वह हिंदी लिटरेचर में स्नातक हैं और 1980 के दशक में उन्होंने पानी की समस्या पर काम करना शुरू कर दिया था। बारिश पानी का सबसे बड़ा स्रोत है और उन्होंने इसी बारिश के पानी को जमीन के अंदर पहुंचाने की ठानी। इसके लिए उन्होंने प्राचीन भारतीय प्रणाली को आधुनिक तरीके से अपनाया। ग्रामीणों की मदद से उन्होंने छोटे-छोटे पोखर, तालाब बनाने शुरू किए। ये पोखर बारिश के पानी से लबालब भर जाते और फिर इनका पानी धीरे-धीरे जमीन में रिस जाता, इससे जमीन का जलस्तर बढ़ जाता है।

जब लोगों ने उड़ाई हंसी
जैसा कि हमेशा होता है। कोशिशें रंग लाएं, उससे पहले लोग पहल करने वाले की जमकर हंसी उड़ाते हैं। ऐसा ही कुछ राजेंद्र सिंह को भी झेलना पड़ा। लोग उनकी हंसी उड़ाकर कहते थे, इन छोटे-चोटे पोखरों से कितने लोगों की प्यास बुझेगा? कितने खेतों को पानी मिलेगा? लेकिन राजेंद्र सिंह भी अपनी धुन के पक्के थे और उन्होंने अपनी कोशिशें जारी रखीं। धीरे-धीरे उनकी कोशिशें रंग लाने लगीं और जल संचय पर काम बढ़ता गया। फिर गांव-गांव में पोखर और जोहड़ बनने लगे और बंजर धरती भी हरियाली की चादर ओढ़ने लगी। इन पोखरों और जोहड़ों का कमाल यह है कि अकेले राजस्थान के ही हजार से ज्यादा गांवों में फिर से पानी सुलभ हो गया है। राजेंद्र सिंह की मेहनत का ही असर है कि अलवर शहर की तस्वीर बदल गई है। यहां कबी गर्मियों में लोग बूंद-बूंद को तरस जाते थे और आज यहां पानी जैसे कोई समस्या है ही नहीं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राजेंद्र सिंह ने उन्हें जल पुरुष का जो नाम दिया गया है से सही साबित किया है।

Posted By: Digpal Singh