नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। पिछले दो सप्ताह से देश में बने आतंकी और युद्ध जैसे माहौल का स्थायी समाधान करने के लिए केंद्र सरकार ने देश के अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर सख्त रुख अख्तियार किया हुआ है। भारत एक तरफ जहां पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरे हुए है, वहीं पुलवामा हमले के बाद से लगातार आतंकी संगठनों और उन्हें बढ़ावा देने वाले अलगवादियों पर भी शिकंजा कस रहा है। जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार अब ऐसे कुछ और संगठनों पर जल्द कार्रवाई कर सकती है।

केंद्र सरकार ने गैर-कानूनी और विध्वंसकारी गतिविधियों में शामिल होने के कारण कश्मीर के कट्टरपंथी अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी पर गुरुवार को प्रतिबंध लगा दिया है। इस पर कई विध्वंसक कार्रवाई में शामिल होने के आरोप हैं। इसके साथ ही कई आतंकी संगठनों से इसका संपर्क रहा है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की उच्च स्तरीय समिति की बैठक में ये फैसला लिया गया था।

बैठक के बाद केंद्रीय गृहमंत्रालय ने आदेश प्रतिबंध लागू करने के आदेश जारी किए थे। घाटी में बीते एक सप्ताह के दौरान करीब 500 जमात के कार्यकर्ता पकड़े जा चुके हैं। केंद्र द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अब गिरफ्तारियों का सिलसिला और तेज होने के साथ ही जमात के संस्थानों पर तालाबंदी भी शुरू हो जाएगी।

22 फरवरी को गिरफ्तार हुए थे अलगाववादी नेता
पुलवामा हमले के बाद कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करते हुए पिछले सप्ताह (22 फरवरी 2019) को पुलिस ने जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट और जमात-ए-इस्लामी के 150 से अधिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया था। जमात पर ये अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है। इस कार्रवाई में जमात-ए-इस्लामी प्रमुख अब्दुल हामिद फयाज सहित दर्जनों नेता शामिल थे। अलगाववादियों पर हुई इस कार्रवाई का महबूबा मुफ्ती ने जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं की की गिरफ्तारी की निंदा भी की थी। महबूबा अकेली नहीं हैं, पूर्व राज्यमंत्री सज्जाद लोन ने भी इस कार्रवाई का विरोध किया था।

हिजबुल का दाहिना हाथ माना जाता है जमात-ए-इस्लामी
1990 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था। उस समय अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का दाहिना हाथ माना जाता था। उस वक्त जमात-ए-इस्लामी, हिजबुल की राजनीतिक शाखा के तौर पर काम करता था। इसके विपरीत जमात-ए-इस्लामी खुद को हमेशा सामाजिक और धार्मिक संगठन बताता रहा है। आज भी जमात का एक एक बड़ा कैडर, हिजबुल से जुड़ा हुआ है।

इसलिए जमात पर लगा प्रतिबंध
जमात ने ही कश्मीरी युवाओं में अलगाववाद और मजहबी कट्टरता के बीज बोए हैं। बीते चार सालों के दौरान जमात के कई नेता कश्मीर के विभिन्न जगहों पर आतंकियों का महिमामंडन करते भी पकड़े गए हैं। कट्टरपंथी सैय्यद अली शाह गिलानी, मोहम्मद अशरफ सहराई, मसर्रत आलम, शब्बीर शाह, नईम खान समेत शायद ही ऐसा कोई अलगाववादी होगा, जो जमात के कैडर में न रहा हो। यही बात कश्मीर में सक्रिय मुख्यधारा के कई वरिष्ठ नेताओं पर भी लागू होती है। कई पूर्व सुरक्षा अधिकारी और कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कश्मीर में आतंकवाद की रीढ़ के तौर पर जमायत-ए-इस्लामी किसी न किसी तरीके से काम करती है। इसीलिए केंद्र सरकार ने जमात पर प्रतिबंध लगाया है।

जमात का इतिहास
जमात-ए-इस्लामी की नींव 1942 में पीर सैदउद्दीन ने रखी थी। कश्मीर में जमात और नेशनल कांफ्रेंस का ही सबसे बड़ा जनाधार माना जाता है। इसलिए खुद को सामाजिक और धार्मिक संगठन बताने वाले जमात की कश्मीर की सियासत में भी महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्ष 1971 में जमात ने कश्मीर में चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इसके बाद 1972 में जमात के पांच प्रत्याशी पहली बार विधायक बने थे। इनमें कट्टरपंथी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी भी शामिल थे।

जमात ने 1975 में इंदिरा-शेख समझौते का खुलेआम विरोध किया था। इतना ही नहीं जमात को कश्मीर में युवाओं को देश विरोधी गतिविधियों के लिए बरगलाने और पाकिस्तानी नारों के समर्थक के तौर पर भी देखा जाता है। 1987 में जमात ने अन्य मजहबी संगठनों संग मिलकर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट कश्मीर (मफ) बनाया था। आपातकाल के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने भी जमात देश विरोधी गैर कानूनी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से प्रतिबंध लगाया था।

जमात के बाद अब बारी हुर्रियत की
जमात की तरह ही ऑल पार्टीज हुर्रियत कांफ्रेंस (एपीएससी) यानी हुर्रियत पर भी घाटी में अलगाववाद को बढ़ावा देने और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप हमेशा से लगते रहे हैं। प्रमुख हुर्रियत और अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी भी जमात से जुड़े रहे हैं और उससे चुनाव भी लड़ चुके हैं। अब वह इससे अलग हो चुके हैं। माना जा रहा है कि जमात पर शिकंजा करने के बाद अब बारी हुर्रियत की है। हुर्रियत का गठन 13 जुलाई 1993 को हुआ था। हुर्रियत, उन सभी पार्टियों का एक संगठन है जिन्होंने 1987 में नेशनल कांफ्रेंस व कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ा था। आरोप है कि हुर्रियत घाटी में पनप रहे आतंकी आंदोलन को राजनीतिक चेहरा देती रही है। इसके नेता कश्मीर की आजादी या कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने के लिए आंदोलन करते रहे हैं।

हुर्रियत का हिस्सा हैं ये संगठन
हुर्रियत में सात अलग-अलग पार्टियां जमात-ए-इस्लामी, आवामी एक्शन कमेटी, पीपुल्स लीग, इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन, मुस्लिम कांफ्रेंस, जेकेएलएफ और पीपुल्स कांफ्रेंस शामिल हैं। सातों संगठनों के प्रमुख या प्रतिनिधि को हुर्रियत की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में बतौर सदस्य शामिल किया गया है। हुर्रियत की एक 21 सदस्यीय वर्किंग कमेटी और 23 सदस्यों वाली जनरल काउंसिल भी है। इसके दो सदस्यों की पूर्व में हत्या भी हो चुकी है। मई 2002 में पीपुल्स कांफ्रेंस के मुखिया रहे अब्दुली गनी लोन को आतंकियों ने मार दिया था। वह पीपुल्स कांफ्रेंस के वर्तमान मुखिया सज्जाद लोन के पिता थे। सज्जाद, भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी के समर्थक माने जाते हैं। अगस्त 2008 में शेख अजीज भी पुलिस फायरिंग में मारे गए थे।

Posted By: Amit Singh

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