योगेंद्र नारायण। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद से इस देश ने कभी भी लोगों का इतनी बड़ी संख्या में पलायन नहीं देखा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि गांवों और शहरों से अपने घरों की ओर जाने वाली इस प्रवासी आबादी की संख्या करोड़ों में है। रेलवे विशेष ट्रेनें चला रहा है, रोडवेज की बसें लोगों को ले जाने में जुटी हैं, लेकिन स्थिति नियंत्रण में नहीं दिख रही हैं। इस पृष्ठभूमि में प्रवासी मजदूरों और इस समस्या के संभावित पहलुओं का अध्ययन बहुत जरूरी हो जाता है जिसे करने के लिए हमें चार पहलुओं पर विचार करना होगा।

1. प्रवासी श्रमिक अपने गांवों और कस्बों से पलायन क्यों करता है?

2. क्या कोई श्रम कानून है जो उन स्थानों पर प्रवासी श्रमिक की सुरक्षा करे जहां वे आजीविका के लिए काम करते हैं?

3. उस राज्य की जिम्मेदारी क्या है जहां प्रवासी श्रमिक काम कर रहे हैं और रह रहे हैं?

4. प्रवासियों के गृह राज्य की जिम्मेदारी क्या है?

आइए हम इस विश्लेषण के पहले मुद्दे को लेते हैं। प्रवासी श्रमिक जब स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं खोज पाते हैं, चाहे वह उद्योगों में हो, कृषि में हो या फिर व्यावसायिक रूप से। गांवों में रहने वाले इन श्रमिकों के स्थानीय कौशल की हमारे पास कोई गणना नहीं है। कुछ आइटीआइ पास हो सकते हैं, कुछ मोटर मैकेनिक हो सकते हैं, कुछ इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मिस्त्री या कंप्यूटर में पाठ्यक्रम कर चुके होंगे। इनके कौशल का पता ही नहीं है। स्थानीय उद्योगपति और रियल स्टेट उद्यमी अपनी आवश्यकताओं को अन्य स्थानों से पूरा करने की कोशिश करते हैं।

यदि किसी तरह से उद्योगपतियों और व्यावसायिक स्टार्ट अप्स के लिए यह अनिवार्य किया जा सके कि उन्हें पहले स्थानीय प्रतिभाओं को रोजगार देना होगा और उसके बाद ही जिले के बाहर के लोगों को रोजगार दिया जा सकता है। यह स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करेगा और वे दूसरी जगहों पर जाने के लिए आकर्षित नहीं होंगे। यह जिला मजिस्ट्रेट और राजस्व अधिकारियों का काम होना चाहिए कि वे गांव के कौशल का पता लगाएं। यह प्रवास की समस्या को दूर करेगा। जहां तक दूसरे मुद्दे की बात है प्रवासी श्रम को असंगठित क्षेत्र के हिस्से के रूप में वर्गीकृत किया गया है, इसलिए वे श्रम कानूनों के तहत नहीं आते हैं।

भारत में कहा जाता है कि 90 फीसद श्रम असंगठित क्षेत्र में है। इन कर्मचारियों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। उन्हें छुट्टियां दी जाएं या न्यूनतम मजदूरी दी जाए, इस बात की किसी को भी चिंता नहीं है। साथ ही वैधानिक रूप से कोई भी चिकित्सा सुविधा नहीं है। आप इन लोगों को ढाबों, मिठाई की दुकानों, रिक्शा खींचते हुए या खाद्यान्न सामग्री को गाड़ियों में उतारते या चढ़ाते देखते हैं। यही वजह है कि जब सरकार उन्हें वित्तीय सहायता या मुफ्त खाद्यान्न देना चाहती है, तो इसमें असंगठित क्षेत्र के ऐसे लोगों की संख्या और नाम नहीं होते हैं। उनका कोई रिकॉर्ड नहीं होता है। इसका समाधान प्रवासी श्रम को श्रम कानूनों के अंतर्गत लाने में निहित है।

अब हम तीसरे मुद्दे पर आते हैं, प्रवासी मजदूर जहां पर काम कर रहे हैं, वहां की राज्य सरकार इनके प्रति अपनी

कोई जिम्मेदारी नहीं समझती है। वे इन्हें देखभाल के लिए उन उद्योगों और स्थानीय प्रतिष्ठानों के भरोसे छोड़ देते हैं, जहां पर ये प्रवासी श्रमिक काम करते हैं। यदि प्रवासी श्रमिकों को उनका वेतन नहीं मिल रहा है और किराया नहीं दे पाने के कारण उन्हें जबरन निकाला जा रहा है तो राज्य सरकार हस्तक्षेप नहीं करती है। यदि उनके पास भोजन या फिर दवा नहीं है तो स्थानीय सरकार सहायता नहीं करती हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत राज्यों के लिए ऐसे सभी लोगों को राष्ट्रीय आपदा के समय उनके वेतन के 50 फीसद तक आर्थिक सहायता देने को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

आखिरकार, प्रवासी का श्रम उस राज्य के कल्याण में योगदान दे रहा है जिसमें वे काम कर रहे हैं। जहां तक चौथे मुद्दे का संबंध है, यह उस राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने राज्य से पलायन कर चुके श्रमिकों के कल्याण की देखभाल करे। जिस प्रकार हमारे दूतावास विदेशों में भारतीयों के हितों के लिए काम करते हैं, इसी प्रकार राज्य के नागरिकों की देखभाल करना गृह राज्य का कर्तव्य है। संकट के इस वक्त में प्रवासी श्रमिक को राज्य सरकार के ई पोर्टल के माध्यम से खुद को पंजीकृत करने के लिए कहा जाना चाहिए और यह पूछा जाना चाहिए कि ऐसे वक्त में उन्हें किसी मदद की आवश्यकता है या नहीं। संकट के समय लोगों और वाहनों के आवागमन पर अंतरराज्यीय प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।

यदि लोग बस से यात्रा नहीं करना चाहते हैं तो उन्हें पैदल या अन्य किसी माध्यम के जाने की अनुमति होनी चाहिए। पैदल चलकर आने वाले मजदूरों और पुलिस की लाठियों से वापस भेजे जाने के दृश्य कल्याणकारी राज्य की छवि पेश नहीं करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत, भारत के नागरिकों को पूरे भारत में आनेजाने की स्वतंत्रता है। आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 को उस अधिकार को नहीं छीनना चाहिए। चिकित्सकीय सावधानियों को छोड़कर अंतरराज्यीय और अंतर जिला आवागमन को प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।

( लेखक राज्यसभा के पूर्व महासचिव हैं)

Posted By: Kamal Verma

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