नीलू रंजन, नई दिल्ली। मक्का मस्जिद धमाके में आरोपियों की सबूतों के अभाव में बरी किया जाना नई बात नहीं है, भारत में आतंकी हमले के मामले आरोपियों के बरी होने की लंबी फेहरिस्त है। आतंकवाद से निपटने में जुड़ी एजेंसियों के अधिकारियों के अनुसार ऐसे में मामलों में सामान्य अपराध जैसे ठोस जुटाना आसान नहीं है और कानून की इसी कमजोरी लाभ आतंकी हमले के आरोपियों को मिलता रहा है।

आतंकवाद के खिलाफ सक्रिय जांच और सुरक्षा से जुड़ी एजेंसी का कोई भी अधिकारी मक्का-मस्जिद धमाके में आरोपियों की रिहाई पर बोलने के तैयार नहीं है। इस मामले में सीबीआइ द्वारा 10 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करना और फिर असीमानंद के खुद मक्का मस्जिद में धमाका करने का अपराध स्वीकार कर लेना और एनआइए की उनके समेत 10 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करना किसी के गले नहीं उतर रहा है। राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मुद्दे पर बोलने से हर अधिकारी कतराता नजर आया।

वैसे जांच एजेंसी से जुड़े कुछ अधिकारियों का कहना था कि मक्का मस्जिद धमाके में आरोपियों की रिहाई कोई नई बात नहीं है। भारत में आतंकवादी मामलों में ऐसा पहले भी होता रहा है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण अब्दुल करीम टुंडा है, जिसे लश्करे तैयबा का बड़ा आतंकी बताया गया था और भारत में 20 आतंकी हमलों में वांछित था। नेपाल में उसकी गिरफ्तारी और भारत लाए जाने को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की बड़ी कामयाबी के रूप में प्रचारित भी किया गया था। लेकिन हालात यह है कि अदालत में उसके खिलाफ कोई भी सबूत टिक नहीं पा रहा है। टुंडा एक-के-बाद-एक मामलों में सबूतों के अभाव बरी होता जा रहा है। यही हाल पुणे के जर्मन बेकरी में धमाके के आरोप में गिरफ्तार अब्दुल समाद भटकल और मिर्जा हिमायत बेग भी बरी हो चुका है। ऐसे मामलों की लंबी फेहरिस्त है।

जांच एजेंसी के अधिकारी आतंक के मामले में आरोपियों की रिहाई के लिए कमजोर कानून को ज्यादा जिम्मेदार ठहराते हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आतंकवाद के मामलों को सामान्य कानूनी तरीके से नहीं निपटा जा सकता है। समस्या यह है कि भारत में आतंकवाद के खिलाफ टाडा और पोटा जैसे विशेष कानून बनाने का प्रयोग राजनीतिक कारणों से बुरी तरह विफल रहा है। उन्होंने कहा कि आतंकवादी घटना के पूरी साजिश के तहत अंजाम दिया जाता है, जिसकी जानकारी मात्र दो-चार लोगों को होती है। इस बारे अधिकांश जानकारी खुफिया एजेंसियों के मार्फत, गिरफ्तारी दूसरे आतंकियों से पूछताछ या फिर पूछताछ के दौरान खुद आतंकी के स्वीकारोक्ति से आती है।

समस्या यह है खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता है। दूसरे आतंकियों के बयान को टाडा में सबूत बनाया गया था, लेकिन टाडा के साथ यह प्रावधान भी रद्दी की टोकरी में चला गया। सीआरपीसी और आइपीसी में पुलिस के सामने आरोपियों के स्वीकारोक्ति के बयान को भी अदालत सबूत नहीं मानती है। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आरोपियों की रिहाई पर राजनीतिक बयानबाजी तो बहुत होता है, लेकिन समस्या की असली वजह को दुरूस्त करने पर चर्चा बिल्कुल नहीं होती है।

 

By Sachin Bajpai