'वे बहुत विनम्र इंसान हैं', अमेरिकी मिडटर्म में अब्दुल अल-सैयद की जीत पर कर्नाटक के भटकल में मना जश्न
अमेरिका में अब्दुल अल-सैयद के पहले मुस्लिम सीनेटर चुने जाने का जश्न भारत के कर्नाटक के भटकल में भी मनाया ...और पढ़ें

अब्दुल अल-सैयद बने अमेरिकी सीनेटर

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका में हुए चुनावों के नतीजों का जश्न जहां वाशिंगटन से लेकर पूरे अमेरिका में मनाया जा रहा है, वहीं इस जश्न की गूंज भारत में कर्नाटक के शहर भटकल तक सुनाई दे रही हैं। भटकल के एक परिवार के पास खुस होने की बेहद खास और निजी वजह है।
अमेरिका में राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए अब्दुल अल-सैयद देश के पहले मुस्लिम सीनेटर चुने गए हैं। भारत में उनकी पत्नी सारा के रिश्तेदारों के लिए यह ऐतिहासिक जीत बेहद गर्व और आत्मीयता का पल है।
सैयद के भारत में पारिवारिक रिश्ते
अब्दुल अल-सैयद अमेरिका में भले ही एक चर्चित और प्रभावशाली राजनीतिक चेहरा हों, लेकिन भटकल में रहने वाले उनके रिश्तेदारों के लिए वे एक बेहद विनम्र, सहज और मिलनसार इंसान हैं। सारा के चचेरे भाई-बहन, जुकाकू शम्सुद्दीन जिया और बीबी हुस्ना ने इस शानदार जीत पर बेहद खुशी जताई।
हुस्ना ने बताया कि वोटों की गिनती और पूरे चुनाव अभियान के दौरान परिवार काफी तनाव में था। वे अमेरिका में मौजूद अपने अंकल के साथ लगातार संपर्क में थे, जो उन्हें चुनावी गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे।
हुस्ना के मुताबिक, नतीजे आने के बाद जब उन्होंने अपने अंकल को फोन किया, तो पता चला कि उनके घर पर जश्न का माहौल है, जहां परिवार के कई सदस्य और मेहमान मौजूद थे। परिवार के लोग दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर रहते हैं, इसलिए इस जीत का जश्न मुख्य रूप से व्हाट्सएप ग्रुप्स और वीडियो कॉल के जरिए ऑनलाइन मनाया गया।
कर्नाटक के दामाद
अब्दुल का भटकल से नाता कई साल पुराना है। सारा के पिता, डॉ. सैयद, अपने बच्चों को इस तटीय शहर में जरूर लाते थे ताकि वे अपनी पारिवारिक जड़ों और रिश्तेदारों से जुड़े रहें। लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय पहले अब्दुल अपनी पत्नी सारा के साथ एक चचेरे भाई की शादी में शामिल होने भटकल आए थे। उस दौरान वे रिश्तेदारों के साथ तीन-चार दिन रुके थे।
रिश्तेदारों के पास उनकी यादें आज भी तरोताजा हैं। हुस्ना ने उन्हें कर्नाटक का दामाद कहकर संबोधित किया और बताया कि वे बेहद ज्ञानवान, संस्कारी और तमीजदार इंसान हैं जो कभी किसी को नीचा नहीं दिखाते। वहीं ज़िया ने याद किया कि अब्दुल को भटकली खाना बहुत पसंद आया था। उन्हें यहां की खास बिरयानी, स्थानीय व्यंजन और यहां का प्रसिद्ध मिर्च का पेस्ट लोनमिरी बहुत पसंद था, जो व्यंजनों को एक अनोखा स्वाद देता है।
दादाजी की जनसेवा की विरासत
बेंगलुरु में रहने वाले जिया के लिए यह जीत केवल राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि यह उनके परिवार की जनसेवा की विरासत से भी जुड़ी है। जिया के दादाजी, जे.एच. शम्सुद्दीन, तत्कालीन मैसूर राज्य में मंत्री रह चुके थे और अपनी निष्ठा व ईमानदारी के लिए जाने जाते थे।
जिया को अपने दादाजी और अब्दुल अल-सैयद के बीच काफी समानताएं नजर आती हैं। उन्होंने कहा कि दोनों के बीच दो सबसे बड़ी समानताएं हैं, उनकी बेदाग ईमानदारी और सच्चाई के साथ जनता की सेवा करने की गहरी इच्छा। जिया ने कहा, अब्दुल बहुत सीधे-सादे इंसान हैं और उनके स्वभाव में कोई दोमुंहापन नहीं है। वे सिद्धांतों पर टिके रहने वाले व्यक्ति हैं।
इस्लामफोबिया के खिलाफ करारा जवाब
परिवार इस ऐतिहासिक उपलब्धि को केवल एक व्यक्तिगत जीत के रूप में नहीं देख रहा है। हुस्ना ने इसे दुनिया भर में फैले इस्लामफोबिया, डराने-धमकाने की ताकतों और दुष्प्रचार अभियानों के खिलाफ एक करारा जवाब बताया। उन्होंने कहा कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों और नफरत के अभियानों के बावजूद अब्दुल ने जो सफलता हासिल की है, वह भ्रष्टाचार और नकारात्मक राजनीति के खिलाफ एक बड़ी जीत है।
वहीं, जिया ने अल-सैयद के राजनीतिक विजन और चुनावी वादों पर बात की। अब्दुल के मुख्य मुद्दों में राजनीति से पैसे का प्रभाव खत्म करना, जनता की जेब में सीधे लाभ पहुंचाना और सभी के लिए मुफ्त व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा शामिल हैं।
जिया के अनुसार, ये ऐसी बातें हैं जो केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत जैसे विकासशील देशों के आम नागरिकों के दिलों को भी छूती हैं। उन्होंने कहा कि भारत में भी लोग ऐसे ही साफ-सुथरी छवि और जन कल्याण के प्रति समर्पित नेताओं की आकांक्षा रखते हैं।
सुरक्षा की चिंता और भविष्य की उम्मीदें
हुस्ना ने कहा कि वे जानते हैं कि अब्दुल की इस नई और बड़ी भूमिका से लोगों को काफी उम्मीदें हैं। पूरा परिवार ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि अब्दुल अपने सभी चुनावी वादों को सफलतापूर्वक पूरा करें। इसके साथ ही, अमेरिकी राजनीति के चुनौतीपूर्ण माहौल को देखते हुए परिवार को अब्दुल और उनके पूरे परिवार की सुरक्षा को लेकर भी थोड़ी चिंता बनी रहती है।
हुस्ना ने कहा कि जब हजारों मील दूर मिली किसी ऐतिहासिक जीत का संबंध आपके अपने घर से होता है, तो पूरी दुनिया बहुत छोटी महसूस होने लगती है।
परिवार को भरोसा है कि अब्दुल का सीनेटर के रूप में कार्यकाल अमेरिकी समाज में सकारात्मक बदलाव लाएगा और भटकल के साथ अमेरिका का यह खूबसूरत रिश्ता हमेशा अच्छे कारणों से याद रखा जाएगा।
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