डा. ब्रजेश कुमार तिवारी। पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरु पर्व के दिन देश को चौंका दिया जब उन्होंने घोषणा की कि उनकी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने का निर्णय लिया है। पूरी संसदीय प्रक्रिया को पूरा करने के बाद करीब एक साल पहले कृषि कानूनों को पारित किया गया था। सरकार द्वारा दावा किया गया था कि कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों सहित कई लोगों से बात कर किसानों की स्थिति में सुधार के लिए ये कृषि कानून लाए गए थे। हालांकि प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि वह देश को समझाने में पूरी तरह से सक्षम नहीं रहे जिस कारण कुछ लोगों को इसका समर्थन नहीं मिल रहा।

देश में हर 100 में से लगभग 80 किसान छोटे किसान हैं। उनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। इनकी संख्या 10 करोड़ से ज्यादा है। सरकार किसानों खासकर छोटे किसानों के हित में एक के बाद एक कदम लगातार उठा रही है। सरकार द्वारा फसलों की खरीद ने पिछले दशकों के रिकार्ड तोड़ दिए हैं। वर्तमान में, कृषि क्षेत्र मौजूदा कीमतों पर भारतीय सकल घरेलू उत्पाद में 16 प्रतिशत तक का योगदान देता है। राजस्व अर्जित करने के लिए पूर्व में कृषि राष्ट्र का प्राथमिक स्रोत था। हालांकि पिछले कुछ दशकों में कृषि क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान में भारी कमी आई है। तदनुसार, तीन कृषि विधेयक पारित किए गए जो स्वतंत्र किसानों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करते हैं और कृषि क्षेत्र को अपने कामकाज में कुशल बनाते हैं।

निरस्त किए गए कानूनों में पहले कानून के तहत, किसानों को राज्य के भीतर व्यापार के लिए बाधाओं का सामना किए बिना कृषि उपज बेचते समय अधिक स्वतंत्रता का अनुभव होता। किसानों को वित्तीय स्वतंत्रता का भी अनुभव होता, क्योंकि उन्हें इस तरह के व्यापार पर कोई शुल्क नहीं देना होता। दूसरे कानून से किसानों को अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में कारपोरेट्स के साथ व्यापार करने और अपने माल के लिए अधिक लाभ कमाने की अनुमति मिलती। तीसरा कानून बताता है कि सरकार केवल असाधारण परिस्थितियों में ही प्याज, अनाज, तेल आदि जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, वितरण्, व्यापार को विनियमित कर सकती है।

(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

Edited By: Sanjay Pokhriyal