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500 रुपये की घड़ी और तीन दशक का इंतजार, सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया खूनी विवाद

Published: Sat, 27 Jun 2026 02:00 AM (IST)

अब लगभग तीन दशकों (29 साल) के लंबे इंतजार के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस दर्दनाक आपराधिक मामले का पटाक्षेप ...और पढ़ें

500 रुपये की घड़ी और तीन दशक का इंतजार, सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया खूनी विवाद (फोटो- एएनआई)

500 रुपये की घड़ी और तीन दशक का इंतजार, सुप्रीम कोर्ट ने खत्म किया खूनी विवाद (फोटो- एएनआई)

HighLights

  1. मामला उत्तराखंड के देहरादून का, 1997 में पड़ोसियों के बीच घड़ी को लेकर मामूली विवाद में हुई थी हत्या 

  2. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तीन लोगों को दोषी ठहराया, सुप्रीम कोर्ट ने तीन दशक पुराने मामले का निपटारा किया 

पीटीआई, नई दिल्ली। यह कहानी जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही सबक देने वाली भी है कि कैसे एक पल का गुस्सा पूरी जिंदगी को तबाह कर सकता है। साल 1997 में महज 500 रुपये की एक घड़ी को लेकर दो पड़ोसियों के बीच शुरू हुआ मामूली विवाद एक व्यक्ति की मौत और तीन परिवारों की बर्बादी का सबब बन गया।

अब लगभग तीन दशकों (29 साल) के लंबे इंतजार के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस दर्दनाक आपराधिक मामले का पटाक्षेप किया है। मामूली बहस से बिछी लाश मामला उत्तराखंड के देहरादून का है।

पद्म सिंह नाम के एक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी मनुआ को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी। मनुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और उसने उसे वापस करने की कोशिश की। इसी बात पर दोनों में बहस शुरू हो गई।

देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ा कि मनुआ के साथ रामू और मथु भी शामिल हो गए। उन्होंने एक सूखे नहर के किनारे खड़े पद्म सिंह पर हमला कर दिया। मथु ने पद्म सिंह के सिर पर भारी पत्थर से वार किया, जिससे वह संतुलन खोकर सूखी और पथरीली नहर में गिर गए।

अस्पताल ले जाने पर उन्होंने दम तोड़ दिया। इंसाफ की कगार पर थमी जिंदगी साल 2002 में देहरादून की स्थानीय अदालत ने तीनों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए पांच साल की कठोर सजा सुनाई।

2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद हाईकोर्ट के फैसले को 2012 में ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए मानवीय पहलू को सर्वोपरि रखा।

इसने पाया कि इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान तीन में से दो दोषियों की मौत हो चुकी है। इकलौता जीवित बचा दोषी, मथु, जो घटना के वक्त 33 साल का नौजवान था, आज 60 साल से अधिक का बुजुर्ग हो चुका है।

कोर्ट ने माना कि सिर की चोटें सूखी नहर के पथरीले धरातल पर गिरने की वजह से लगी थीं। मथु पहले ही डेढ़ साल की जेल काट चुका है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, पांच साल की सजा को उसके द्वारा पहले से काटी गई डेढ़ साल की अवधि में बदल दिया और कानूनी कार्यवाही को हमेशा के लिए बंद कर दिया।