नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। छह से चौदह साल तक के बच्चों को अनिवार्य एवं मुफ्त पढ़ाई के लिए 'शिक्षा का अधिकार' कानून के अमल के दो साल बाद भी चुनौतियां कम नहीं हैं। उसे लेकर खुद सरकार के पसीना छूट रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने गैर सरकारी एवं सरकार से सहायता न लेने वाले स्कूलों में भी गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत दाखिले की राह खोल दी है। निजी स्कूलों ने उसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की भी तैयारी शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि निजी स्कूल तीन जजों की पीठ द्वारा दिए गए उक्त फैसले में उस जज के निर्णय को आधार बना सकते हैं जिन्होंने उनके हक में फैसला दिया था।

शिक्षा का अधिकार कानून के मुताबिक प्राइमरी स्तर पर एक शिक्षक पर 30 बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा आदर्श स्थिति है। लेकिन कानून पर अमल के दो साल बाद भी देश के नौ प्रतिशत स्कूल महज एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। कानून पूरी तरह योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों का प्रावधान करता है, लेकिन 20 फीसदी शिक्षक जरूरी मानकों पर खरे ही नहीं उतरते। इसी तरह प्राइमरी की एक कक्षा में 30 बच्चे होने चाहिए, लेकिन यह स्थिति भी अभी 37 पर टिकी हुई है।

स्कूलों में रैंप होना जरूरी है, जबकि 50 फीसदी में यह नहीं है। खेल का मैदान भी होना लाजिमी हैं। इन सबसे भी बड़ी बात हर स्कूल में पीने के पानी की व्यवस्था होनी ही चाहिए। अटपटा लग सकता है, लेकिन सात प्रतिशत स्कूल इस बेहद जरूरी सुविधा से भी वंचित हैं। कानून कहता है कि कोई बच्चा फेल नहीं किया जाएगा। स्कूलों के सामने इस चुनौती के अलावा बीच में पढ़ाई छोड़ने की भी स्थिति बरकरार है। लगभग सात फीसदी बच्चे अब भी बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। सिर्फ शिक्षा का अधिकार कानून के अमल की रोशनी में ही सवा पांच लाख अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत है। दूसरी तरफ प्रारंभिक शिक्षा में कार्यरत कुल शिक्षकों में से 7.74 लाख योग्य एवं प्रशिक्षित ही नहीं हैं। 5.23 लाख शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।

कानून के अमल में राज्यों की उदासीनता का आलम यह है कि अभी तक सिर्फ 29 राज्यों में पढ़ाई के लिए न्यूनतम दिन तय किए हैं। सिर्फ 31 राज्यों ने तय किया कि कोई बच्चा फेल नहीं किया जाएगा। प्रारंभिक शिक्षा को एक से आठवीं [आठ साल] तक के क्रम में रखना है। 28 राज्यों ने ही इसका प्रावधान किया है।

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