श्रवण शर्मा (बालाघाट)। कल तक हाथों में कुल्हाड़ी लेकर जंगल में पेड़ काटती थीं। दो जून की रोटी तो छोड़िए चूल्हा जलाने का ही इंतजाम कर पाती थीं। छोटी-छोटी जरुरतों के लिए सूदखोंरों से उधार लेना पड़ता था। खेती के लिए बैंकों से कर्ज। लेकिन गत 10 वर्षों में हालात पूरी तरह बदल गए। बालागाट, मप्र के नक्सल प्रभावित परसवाड़ा क्षेत्र की ग्रामीण आदिवासी महिलाएं अब चार करोड़ की पूंजी वाले अपने ही बैंक के सदस्य हैं। इन महिलाओं ने सामूहिक प्रयास से तरक्की की मिसाल पेश की है।

जैविक खेती से चावल और सब्जी उत्पादन में सफलता हासिल कर इन आठ हजार से अधिक महिलाओं ने अपने घर परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती दी है। दस-दस रुपए की पूंजी से शुरू हुई बचत 10 साल में चार करोड़ तक पहुंच गई है। महिलाएं अपने इस बैंक से ही कर्ज लेती हैं, वह भी बिना ब्याज पर और इसी में पैसे जमा करती हैं। जिन गांवों में सिंचाई का साधन नहीं है, वहां पर सामूहिक पूंजी से महिलाओं ने ट्यूबवेल खुदवाया है।

वह अपनी उपज इकट्ठा करके एक साथ बाजार में भेजती हैं। 152 गांवों के 175 समूहों में आठ हजार महिलाएं एक-दूसरे की मदद से आगे बढ़ रही है। 400 प्रशिक्षित महिलाएं गांव-गांव जाकर समूह की महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं। करीब साढ़े चार हजार महिलाएं जैविक कृषि कर रही हैं। मिर्च, टमाटर से लेकर अन्य सब्जियों की खेती कर रही है। वहीं 300 महिलाएं बकरी पालन और इसी तरह करीब 650 महिलाएं मुर्गी पालन कर रही हैं।

 

Posted By: Srishti Verma