नई दिल्‍ली (जेएनएन)। कोविड-19 महामारी के दौरान दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता वैक्सीन की तलाश में जुटे हैं। दुनिया के इतिहास में इससे पहले ऐसी कोई मिसाल नहीं है, जब इतने बड़े पैमाने पर वैक्सीन बनाने का काम किया जा रहा हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक दुनिया में 176 वैक्सीन विभिन्न चरणों से गुजर रही हैं। ऐसे में यह महामारी के प्रति वैश्विक चिंता को उजागर करता है तो इसके प्रति विभिन्न देशों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की गंभीरता को भी दर्शाता है। वैश्विक स्तर पर प्रमुख वैक्सीन की स्थिति इस प्रकार है।

वैक्सीन हासिल करने की दौड़ में ये देश सबसे आगे 

अमेरिका: एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में सितंबर मध्य तक चार वैक्सीन के बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल हो सकते हैं। हेल्थ एंड ह्यूमन र्सिवस के उप प्रमुख पॉल मैंगो के मुताबिक, यह सही ट्रैक पर है। इस साल के आखिर तक स्वीकृत वैक्सीन की सुरक्षित और प्रभावी दसियों लाख खुराक लोगों के लिए होगी। मैंगो ने कहा कि प्रत्येक चरण में 3 क्लीनिकल परीक्षण होंगे, जिनमें 30 हजार स्वयंसेवकों को नामांकित किया जाएगा। अमेरिका में मॉडर्ना की वैक्सीन तीसरे चरण में है। जबकि जॉनसन एंड जॉनसन और नोवावैक्स की वैक्सीन दूसरे चरण में क्लीनिकल ट्रायल से गुजर रही हैं।

ब्रिटेन: ब्रिटेन किसी भी प्रभावी कोरोना वायरस वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग की अनुमति देने से पूर्व अपने कानूनों को संशोधित करने की तैयारी में जुटा है। हालांकि यह पूर्णत: सुरक्षित और गुणवत्ता के स्तर पर खरा होना चाहिए। ब्रिटेन में वैक्सीन के लिए लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। ऐसे में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की सरकार ने कहा है कि वह देश की दवाओं की नियामक एजेंसी को कोविड-19 वैक्सीन की अस्थायी अनुमति देने जा रही रही है, बस शर्त यह है कि वह सुरक्षा और गुणवत्ता के मानकों को पूरा करे। आमतौर पर, टीके का उपयोग लाइसेंस की प्रक्रिया पूरी होने के बाद किया जाता है। जिसमें कई महीने लग सकते हैं। दूसरी ओर, ब्रिटेन में एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के शुरुआती दो ट्रायल सकारात्मक रहे हैं और इसके तीसरे चरण का ट्रायल दुनिया के कई देशों में किए जा रहे हैं। इसे लेकर डब्ल्यूएचओ तक ने उम्मीद जताई है।

 

चीन: वैश्विक स्तर पर आठ वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल के तीसरे चरण तक पहुंच चुकी हैं, इनमें से चीन की चार वैक्सीन हैं। सिनोवैक बायोटेक की वैक्सीन को चीन में जुलाई में ही आपातकालीन उपयोग के लिए मंजूरी दी थी। वहीं सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी चाइना नेशनल फार्मास्युटिकल ग्रुप (सिनोफार्म) की एक इकाई चाइना नेशनल बायोटेक ग्रुप (सीएनबीजी) ने कहा है कि उसकी कोरोना वैक्सीन को भी आपातकालीन इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिल गई है। सीएनबीजी के दो वैक्सीन तीसरे चरण तक पहुंच चुकी हैं, ऐसे में किसे अनुमति मिली है इसके बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं है।

भारत: भारत बायोटेक और जाइडस कैडिला के वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल के दूसरे चरण में पहुंच चुके है। भारत बायोटेक ने इस वैक्सीन को भारतीय आर्युिवज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के साथ मिलकर विकसित करने में जुटा है। इसे कोवाक्सिन का नाम दिया गया है। जाइडस कैडिला के वैक्सीन जायकोव-डी के पहले चरण का ट्रायल सफल रहा था, जिसके बाद इसके दूसरे चरण का ट्रायल किया जा रहा है। पहले चरण के ट्रायल में जिन लोगों को इसकी खुराक दी गई, उन पर इसका कोई नकारात्मक असर देखने को नहीं मिला है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के अनुसार साल के अंत तक देश को कोरोना की वैक्सीन मिल जाएगी। वहीं ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन को विकसित करने में भारत के सीरम इंस्टीट्यूट भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। महाराष्ट्र सहित देश के कई अन्य हिस्सों में इसका ट्रायल किया जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया: ऑस्टे्रलिया का मर्डोक चिल्ड्रंस रिसर्च इंस्टीट्यूट का कोरोना वैक्सीन भी दुनिया की उन आठ वैक्सीन में शुमार है, जो क्लीनिकल ट्रायल के तीसरे चरण में है। वहीं ऑस्ट्रेलिया के सीएसएल और वैक्सीन फिलहाल पहले चरण में ही हैं। 

रूस: पहली वैक्सीन बनाने का दावा रूस ने किया है। उसने इसे स्पुतनिक-5 का नाम दिया है। गैमेलिया रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित इस वैक्सीन को नियामक की स्वीकृति मिल गई है। रूस ने इसे प्रभावी और सुरक्षित बताया है। हालांकि इसे लेकर सवाल भी उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर भारत सहित कई देशों ने रूस की इस वैक्सीन में अपनी दिलचस्पी जाहिर की है।

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