आगरा, रसिक शर्मा। ब्रज का हर कण आदिपुरुष श्रीकृष्ण की लीलाओं का प्रतीक है। ब्रज से सटे राजस्थान में भी कान्हा की लीलाएं झलकती हैं। राजस्थान के नाथद्वारा में विराजमान श्रीनाथ जी का प्राकट्य गोवर्धन पर्वत से है। बहुत से भक्तों को नहीं पता होगा कि द्वापरयुगीन पर्वतराज गोवर्धन की शिलाओं में कृष्ण कालीन लीलााओं के चिन्ह आज भी दिखते हैं। राजस्थान के नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी का स्वरूप गोवर्धन पर्वत की शिला का ही स्वरूप है।

गिरिराज जी यानी कृष्णकालीन वो पर्वत जिन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं पूजा और ब्रजवासियों की रक्षा को अपने बाएं हाथ की कानिष्ठा उंगली पर धारण किया था। करीब 551 वर्ष पूर्व आन्यौर की नरो नामक लड़की की गाय का दूध गिरिराज शिला पर झरने लगा। उसे जब इस बात का पता चला तो उसने गिरिराज शिला पर आवाज लगायी, अंदर कौन है। अंदर से जवाब में तीन नाम सुनायी दिए, देव दमन, इंद्र दमन और नाग दमन। इसी शिला से श्रीनाथ जी का प्राकट्य हुआ और सबसे पहले उनकी बायीं भुजा का दर्शन हुआ। करीब 450 वर्ष पूर्व पूरनमल खत्री ने जतीपुरा में गिरिराज शिलाओं के उपर मंदिर का निर्माण कराया। कन्हैया के गिरिराज पर्वत उठाते स्वरूप के दर्शन श्रीनाथ जी में होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार गिरिराज महाराज, भगवान श्रीकृष्ण और श्रीनाथजी एक ही देव के अनेक नाम हैं। हालांकि मुगलकाल में श्रीनाथजी को सुरक्षित निकालकर नाथद्वारा भेज दिया गया।

औरंगजेब ने दिया था मंदिर तोड़ने का आदेश

औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को तोड़ने के लिए आदेश जारी किया। अनेक मंदिरों की तोड़फोड़ के साथ वृंदावन में गोवर्धन के पास श्रीनाथ जी के मंदिर को तोड़ने का काम भी शुरू हो गया। इससे पहले कि श्रीनाथ जी की मूर्ति को कोइ नुकसान पहुंचे। मंदिर के पुजारी दामोदर दास बैरागी ने मूर्ति को मंदिर से बाहर निकाल लिया। दामाेदर दास बैरागी वल्लभ संप्रदाय के थे और बल्लभाचार्य के वंशज थे। उन्होंने बैलगाड़ी में श्रीनाथजी की मूर्ति को स्थापित किया और नाथद्वारा ले गए। ब्रजवासी आज भी श्रीनाथ जी प्राकट्य स्थल पर जन्माष्टमी पर्व मनाते हैं। संत कन्हैया बाबा के सानिध्य में नंदगांव बरसाना के तमाम ब्रजवासी हर महीने इस स्थली पर उत्सव मनाते हैं।  

Edited By: Tanu Gupta