मेरठ, जागरण संवाददाता। Azadi Ka Amrit Mahotsav 1947 में भारत दो टुकड़ों में बंट गया। विभाजन की त्रासदी ऐसी कि 75 साल बाद भी जख्मों के निशान मिटे नहीं हैं। पाकिस्तान में संपत्ति और पुरखों की तमाम विरासत छोड़कर जान बचाते हुए लोग भारत आ गए।

हौंसलों ने फिर अंगड़ाई ली

जिंदगी आधी आधी बंटी रह गई। लेकिन बेइंतहा दर्द और अपमान के बीच हौंसलों ने फिर अंगड़ाई ली। सियालकोट और लाहौर से मेरठ के रिफ्यूजी कैंपों में पहुंचे लोगों ने परिश्रम और लगन से स्पोर्टस इंडस्ट्री विकसित की जो आज दुनिया में सर्वश्रेष्ठ आंकी जाती हैं।

मुंबई में अपने चाचा के साथ आए थे

लिफाफे बनाने से की थी शुरुआत आज है दो स्पोर्टस फैक्ट्री विक्टोरिया पार्क स्थित कालोनी में रह रहे वयोवृद्ध् स्वतंत्रता सेनानी कृष्ण कुमार खन्ना मूल रूप से पाकिस्तान के शेखुपुरा इलाके के रहने वाले हैं। 1942 में मुंबई में वह अपने चाचा के साथ आए थे। उस दौरान वहां पर कांग्रेस का महाधिवेशन हो रहा था जिसमें अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पास हुआ था। वह वहां पर चले गए और महात्मा गांधी का भाषण सुन कर आजादी के आंदोलन में भागीदारी का जज्बा पैदा हो गया।

ब्रिटिश हुकूमत का झंडा उतार फेंका था

वापस लौट कर शेखुपुरा में न्यायालय की इमारत में लगा ब्रिटिश हुकूमत का झंडा अपने दो साथियों के साथ उतार फेंका और बीच में हथकरघे वाले तिरंगा लगा दिया। उन्हें उस समय सात की सजा हुई थी। बाद में उनके बालिग न होने के कारण सात माह बाद रिहा कर दिया गया। बताया कि उनका परिवार सेना के ट्रक में बैठ कर अमृतसर आया था। उनके पिता ज्ञान चंद किसी काम से मेरठ आए थे। तभी उन्हें जानकारी मिली कि जेल चुंगी के पास एक स्पोर्टस के सामान बनाने वाला कारखाना बिकाऊ है। जिससे स्यालकोट से आए एक व्यक्ति ने आरंभ किया था।

खन्ना स्पोर्टस के नाम से दो फर्म

पिता जी ने कारखाना खरीद लिया। बताते हैं कि शुरुआत में काफी नुकसान उठाना पड़ा। घर में लिफाफे बना कर गुजर बसर करते थे। बताते हैं कि आज खन्ना स्पोर्टस के नाम से दो फर्म हैं। जिन्हें बेटे संचालित करते हैं। उनकी पत्नी कमला का वर्ष 2022 में निधन हो गया। कृष्ण कुमार सामाजिक गतिविधियों में आज भी सक्रिय हैं।

एक माह तक पैदल पार की थी पांचाल पर्वत श्रंखला

रुड़की रोड स्थित सिटी कालोनी में रह रहे सुभाष मल्होत्रा 83 वर्षीय सुभाष मल्होत्रा अपनी मां कृष्णा देवी उम्र 102 वर्ष के साथ रहते हैं। विभाजन के समय उनकी उम्र आठ वर्ष की थी। उम्र के इस पड़ाव पर होने के बावजूद मां को आज भी विभाजन का दर्द उनकी आंखों में उतर आता है। बताती हैं कि उनके पति गुरुदत्त ने 1932 में ग्रेजुएट किया था। उनका घर रावल पिंडी के झेलम जिले में था। वह अपने दो बेटों और एक बेटी के साथ डाक विभाग की गाड़ी में बैठ कर चली थी।

उन्हें भागना पड़ा

जब कश्मीर पहुंची तो पता लगा उनके पीछे जो वाहन चल रहे थे उनमें मौजूद लोगों को मार डाला गया था। कश्मीर में वह कुछ दिन अपने रिश्तेदारों के यहां रही। इसी बीच कबालियों ने हमला कर दिया जिससे उन्हें भागना पड़ा। कृष्णा देवी ने बताया कि एक माह तक वह बच्चों के साथ पीर पंजाल पर्वत श्रंखला को पार कर जम्मू पहुंची। बाद में पति भारत आए। वह रक्षा मंत्रालय में अधीक्षक के पद से सेवा निवृत्त हुए। वहीं सुभाष भी रक्षा मंत्रालय में सीनियर आडिटर के पद से सेवानिवृत्त हुए। कृष्णा देवी के छह बच्चे हैं। सभी खुशहाल जीवन जी रहे हैं। नियम संयम का पालन करने वाली और कृष्णा देवी आज भी कई-कई घंटे पूजा करती हैं। 

Edited By: Prem Dutt Bhatt