SC Decision on UGC: सुप्रीम कोर्ट में अंतिम वर्ष की परीक्षाओं के मामले की आज हुई सुनवाई के बाद अगली सुनवाई 18 अगस्त को होनी है। सुप्रीम कोर्ट में आज हुई सुनवाई के दौरान छात्रों का पक्ष रख रहे एक अन्य वरीष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने यूजीसी दिशानिर्देशों के खिलाफ अंतिम वर्ष की परीक्षा के लिए युवा सेना की याचिका के लिए अपना प्रतिनिधित्व शुरू किया। उन्होंने जीवन के अधिकार पर सवाल उठाया। डीएम एक्ट (DM Act) पर, उन्होंने एमएचए के निर्देश को सूचीबद्ध किया है, जिसमें कहा गया है कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश डीएम प्रावधानों को सख्त बना सकते हैं, लेकिन इसे कमजोर नहीं कर सकते। ये दिशा-निर्देश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा पालन किए जाने के लिए एक न्यूनतम मानक की सख्त व्यवस्था है। वे इसे संकीर्ण नहीं कर सकते हैं।

इससे पहले छात्रों का पक्ष रख रहे अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी का तर्क है कि यात्रा मेरा अधिकार है, संपत्ति मेरा अधिकार है, अनुच्छेद 21 के तहत मेरे पास कई अधिकार हैं, लेकिन फिर मेरे आधिपत्य ने इन अधिकारों को कम करने की अनुमति क्यों दी? यह महामारी जैसी विशेष स्थिति के कारण है। सिंघवी का कहना है कि महामारी एक वैश्विक चिंता है और इसने दुनिया भर में प्रभाव डाला है। वे कहते हैं कि पूर्व में यूजीसी के दिशानिर्देश लचीले और दयालु थे। सिंघवी का तर्क है कि महामारी के दौर में कक्षाएं बाधित हो गईं हैं, तो इस स्थिति में परीक्षाओं का आयोजन कैसे किया जा सकता है? सिंघवी ने कहा है कि यूजीसी दिशानिर्देश प्रकट मनमानी के पहलू के तहत अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं।

यह है पूरा मामला

देश भर के विश्वविद्यालयों की अंतिम वर्ष / सेमेस्टर परीक्षाओं के मामले की सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई होने वाली है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में अंतिम वर्ष की परीक्षाओं पर आज फैसला आ सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 6 जुलाई को देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विभिन्न यूजी और पीजी पाठ्यक्रमों के अंतिम वर्ष या सेमेस्टर की परीक्षाओं को अनिवार्य रूप से 30 सितंबर 2020 तक सपन्न करा लिये जाने से सम्बन्धित परिपत्र जारी किया गया था। उस समय से ही कोरोना वायरस महामारी के बीच परीक्षाएं कराने का विरोध किया जा रहा है। देश भर के अलग-अलग संस्थानों के 31 स्टूडेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जिसमें अंतिम वर्ष या सेमेस्टर की परीक्षाओं को रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में स्टूडेंट्स के रिजल्ट, उनके इंटर्नल असेसमेंट या पास्ट पर्फार्मेंस के आधार पर तैयार किए जाने की मांग की गई है। 

इस बीच, यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि स्टूडेंट्स के एकेडमिक करियर में अंतिम वर्ष की परीक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है। 6 जुलाई को यूजीसी द्वारा जारी दिशा-निर्देश, विशेषज्ञों की सिफारिश के आधार पर और उचित विचार-विमर्श करके ही जारी किया गया है। आयोग ने कहा कि यह दावा गलत है कि यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार अंतिम वर्ष की परीक्षाएं कराना संभव नहीं है। बता दें कि पूर्व में महाराष्ट्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे पर जवाब देते हुए यूजीसी ने कहा था कि एक ओर राज्य सरकार (महाराष्ट्र) छात्र-छात्राओं के हित को ध्यान में रखते हुए शैक्षणिक सत्र शुरू करने की बात कर रही है, जबकि, दूसरी ओर अंतिम वर्ष की परीक्षा रद्द करके और बिना परीक्षा कराए डिग्री देने की बात कर रही है। इससे स्टूडेंट्स के भविष्य को काफी नुकसान होगा।

यूजीसी छात्रों को जीवन और करियर में किसी एक को चुनने पर कर रही है विवश 

इधर, छात्रों का कहना है कि उच्चतम न्यायलय में याचिका पर यूजीसी ने जो हलफनामा दिया है, उसमें कुल्हाड़ कमेटी का जिक्र है। यूजीसी कह रही है कि इसमें कई प्राध्यापक हैं, जबकि ऐसे समय में जब कोविड संक्रमण से देश में लाखों की संख्या में लोग श‍िकार हो चुके हैं, किसी कमेटी में भी हेल्थ एक्सपर्ट या पैनडेमिक एक्सपर्ट होने चाहिए थे। यूजीसी छात्रों को जीवन और करियर में किसी एक को चुनने पर विवश कर रही है। इसे लेकर छात्र बहुत तनाव में हैं।

छात्रों के सामने इंटरनेट कनेक्ट‍िविटी से लेकर पाठ्यक्रम पूरा न होने जैसी कई समस्याएं सामने हैं। छात्रों की मुश्किलें हैं कि देशभर के कॉलेज होली की छुट्टियों के समय ही बंद हैं। इसके बाद लॉकडाउन के कारण उन्हें घर जाना पड़ा। छात्रों की स्टडी मेटेरियल हॉस्टल के कमरों में बंद हैं। 20 से 30 प्रतिशत सिलेबस भी पूरा नहीं हुआ है।  ऐसे में परीक्षा कैसे दे सकते हैं?  

छात्रों का कहना है कि महामारी के दौर में हमें सरकार से मदद की उम्मीद थी, जबकि सरकार हमें मौत के मुंह में धकेल रही है। यदि हम ऑफलाइन परीक्षा देते हैं, तो स्वयं और अन्य छात्रों सहित अभिभावकों, शिक्षकों और कर्मचारियों को भी संक्रमण का खतरा होगा, जिससे भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।  छात्रों ने यूपी बीएड परीक्षा का उदाहरण देते हुए कहा कि हम सभी ने देखा है कि कितनी भीड़ थी और सामाजिक दूरी जैसे नियमों को ताक पर रखकर ये परीक्षा आयोजित कराई गई थी।

वहीं, कुछ छात्रों की यह समस्या है कि यदि वो परीक्षा देने के लिए हॉस्टल में रुकते हैं, तो यहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव नहीं है। छात्र एक ही कमरा, बाथरूम और मेस शेयर करते हैं। उन्होंने बताया कि मकान मालिक हमें किराये पर कमरा देने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके अलावा, कई हॉस्टल क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए हैं। परीक्षा देने के लिए हमें एक राज्य से दूसरे राज्य में यात्रा करनी पड़ेगी। यात्रा के बीच यदि कोई छात्र संक्रमित हो जाता है, तो उसे तुरंत लक्षण नही आते हैं। यदि यह मालूम चलेगा कि परीक्षा केंद्र पर कोई कोविड पॉजिटिव छात्र आया था, तो उस केंद्र पर जिन छात्रों ने परीक्षा दी होगी, उनकी क्या स्थिति होगी। 

Posted By: Nandini Dubey

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