जागरण संवाददाता, धनबाद : आज आजादी को मिले 75 वर्ष हो गए। भारत की आजादी के लिए लड़ने और भारत को आजाद करने के लिए खुद को लगा देने वालों में आज बहुत कम लोग ही हैं। बचपन से आज तक पुस्तकों की पाठ्यक्रमों से लेकर सामान्य सामाजिक स्तर पर होने वाले वाद-विवाद एवं चर्चाओं काअसर हैं। जो कि आजादी की सैकड़ों कहानियां हमारे मानस पटल पर ऐसे छाई हुई हैं जैसे लगता ये कल की ही बात है। रात के बारह बजे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू देश को संबोधित करते हुये देशवासियों को शुभकामनायें देने के साथ ये कहा था कि जब सारी दुनिया सो रही है। हमारा देश एक नई करवट ले रहा है। हम आज दुर्भाग्य की एक अवधि पूरी करते हैं।

आजादी के 75 वर्ष के अवसर पर धनबाद के प्रसिद्ध साहित्यकार सह प्राचार्य डॉ. जेके सिन्हा मेमोरियल आईएसएल डॉ. बी. जगदीश राव बताते हैं कि आज भारत ने अपने आप को फिर पहचाना है। आज हम जिस उपलब्धि का जश्न मन रहे हैं वो हमारी राह देख रही महान उपलब्धियों की दिशा में महज एक कदम है। इस अवसर को ग्रहण करने और भविष्य की चुनौती को स्वीकार करने के लिए क्या हमारे अंदर प्रयाप्त साहस और अनिवार्य योग्यता हैं। स्वतंत्रता के जन्म के पहले हमने प्रसव की सारी पीड़ाएँ सहन की और हमारे दिल उनकी दुखद स्मृतियों से भारी है। बावजूद इसके सुनहरा भविष्य हमारा आह्वान कर रहा है। अब हमारा भविष्य आराम करने के लिए नहीं बल्कि उन प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के निरंतर प्रयत्न से है जिनका हमने बारम्बार शपथ लिया है और हम आज भी देश आज आजादी के अमृत महोत्सव की जश्न में है और हम सब अपने अपने तरीके से देश के प्रति प्रेम को व्यक्तिगत एवं सामूहिक तौर पर मनाने में लगे हैं। आजादी के अमृत महोत्सव पर आज स्वाभाविक रूप से कुछ प्रश्न जो मेरे मन मस्तिष्क में अमृत की धार की तरह प्रवाहित हो रहे हैं। जिन प्रश्नों पर ध्यान दिए बगैर हम सही मायने में आजादी के 75वें वर्ष को मौलिकता के साथ मनाने से वंचित रह जायेंगे।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के 75 वर्ष पूर्व के संबोधन को यदि हम आज के वर्तमान समय की शिक्षा एवं स्वास्थ्य के साथ आमजनों से जुड़े मामलों को देखने और परखने की कोशिश करें तो यह सवाल रह रह कर हमें परेशान करते रहती है कि क्या हम सच में आजादी के 75 वर्ष के अनमोल समय को अमृत काल में परिवर्तित कर पायें। बतौर शिक्षक जब मैं शिक्षा को देखने की कोशिश करता हूँ तो मन न केवल व्यथित होता है बल्कि मस्तिष्क में नकारात्मकता का भाव भी प्रवाहित होने लगता है।

वास्तव में शिक्षा मानव जीवन की वह प्रक्रिया है जिससे न केवल व्यक्ति का निर्माण होता है बल्कि समाज और राष्ट्र का सामूहिक विकास भी निर्भर करता हैं। आज अपने शहर में या अपने प्रदेश में या कहूं पूरे देश में शिक्षा की स्थिति ऐसी बन गई है जहाँ शिक्षा संबंधित बातें तो बहुत हो रही है पर काम के नाम कुछ भी नहीं। ठीक वैसे ही जैसे ढोल बज तो रहा पर न सुर है, न ताल। ऐसा लगता है हम बड़ी-बड़ी बातों से विश्व गुरु या महागुरु बन जाने के नशे में यह देखना और सोचना तक भूल गए है कि आज शिक्षा के नाम पर हो क्या रहा है या हम कर क्या रहे हैं।

हमारे निति निर्धारक शायद यह जानते भी नहीं या जानना चाहते भी नहीं कि किसी देश का सच्चा और पक्का विकास न तो देश के शासकों की बड़ी बड़ी बातों से आंकी जाती और न ही नेताओं की बड़ी बड़ी मूर्तियों को खड़े करने से और न ही खुद को परम ज्ञानी कहने या कहलवाने से अपितु किसी भी देश की सच्ची और पक्की प्रगति उस देश की शिक्षा व्यवस्था, संस्कृति और देश के नागरिकों की सोच पर निर्भर करती है।

इसलिए सही कहा गया है कि यदि किसी राष्ट्र को कमज़ोर करना हो बर्बाद करना हो तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को कमज़ोर कर दिया जाये. इतिहास में इस बात के अनेक प्रमाण है कि जिन देशों ने अपनी शिक्षा को नहीं संभाल पाये वो देश विकास के मार्ग पर चल नहीं पाए।

प्रारंभिक विद्यालय की हो या फिर महाविद्यालय या विश्वविद्यालय की एक और जहाँ सरकारी शिक्षा व्यवस्था खुद में अंतिम स्वाँसे ले रही है वही दूसरी और निजी शिक्षा व्यवस्था मांग और पूर्ति पर मूल्य निर्धारित कर अपने को वस्तु के रूप में खड़ा कर बाजार में लगा दी है। परिणाम आज न तो पढ़ाने वाले शिक्षक खुश हो पा रहें हैं और न ही पढ़ने वाले बच्चे ही खुद में खुश या संतुष्ट हो पा रहे हैं। एक दौड़ से जारी है और सभी दौड़ में शामिल न जाने कहाँ भागे जा रहे हैं। क्या पा रहे इस शिक्षा व्यवस्था से, बच्चे अपने जीवन की एक तिहाई का समय देकर हाथों में कुछ डिग्रियों के साथ खड़े कर दिए जा रहे कतार में। शिक्षण संस्थाओं की स्थिति डिग्रियां पैदा करने वाले फैक्टरियों की तरह हो गई है और हमारे सफलता का पैमाना यह हो गया है कि हम कितने बच्चों के हाथों में डिग्रियां थमाते जा रहें। समय और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन का होना स्वाभाविक भी है और अनिवार्य भी पर परिवर्तन के दौर में शिक्षा के नाम पर जो परोसा जा रहा वह न हमारे बच्चों के व्यक्तिगत विकास के लिए सहायक है और न ही इसमें समाज और राष्ट्र के सामूहिक विकास की संभावना दिखती हैं। शिक्षा की परिकल्पना एक ऐसी प्रक्रिया से की जानी चाहिए जो बच्चों को व्यावहारिक तौर पर सक्षम बनाये न ही किताबी तौर पर ज्ञानी। आज समाज और देश की स्थिति से शिक्षा की संकीर्णता पता साफ़ साफ़ लगाया जा सकता जहाँ हम बेवजह बस लड़ने लड़ाने को तैयार किये जा रहें। कभी आरक्षण के नाम पर कभी आत्म रक्षण के नाम पर तो कभी जाति या धर्म के नाम पर, आखिर ये किस तरह की विश्वगुरु बनने की होड़ हैं। आज जब सारी दुनिया भागी जा रही है सही समय आ गया है कि हम दुनिया के पीछे भागने से खुद को रोके और अपने उस सुंदर और स्वस्थ अतीत को देखे जहां शिक्षा क्लास के बड़े से कमरे से बाहर गुरु के आश्रम में सम्पूर्ण रूप से सभी एक जैसी दी जाती थी भले ही कोई राजा के पुत्र हो या फिर प्रजा का. जहां शिक्षा का तात्पर्य महज ज्ञान का हस्तांतरण नहीं बल्कि संस्कृति से अवगत होना होता था। चुनौतियों से सामना करने की हिम्मत को तैयार करवाना होता था और होता था शिक्षा के साथ संस्कृति और समाज को मज़बूत करना। एक सार्थक शिक्षा अच्छी संस्कृति के निर्माण में सहायक होती हैं और अच्छी संस्कृति अच्छे नागरिक तैयार करती और उसपर ही अच्छे समाज और श्रेष्ठ राष्ट्र की बागडोर निर्भर करती हैं। सूचना क्रांति के दौर में आज पूरी दुनिया सिमटकर जहाँ एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती नज़र आ रही हैं वहीं हम न जाने क्या सोच रहें हैं। शिक्षा की गुणवत्ता को विकसित करने के स्थान पर राजनीति को शिक्षा में विकसित करने के सतत प्रयास में लगे हैं। परिणाम स्वरुप शिक्षा आज न संस्कार ही निर्मित कर पा रही है और न ही रोजगार और 75 वर्ष के आजादी का शिक्षा पर परिणाम दिख रहा है।

Edited By: Atul Singh

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