संतोष शर्मा, अलीगढ़ । Freedom Movement : आजादी की वो पहली सुबह। शायद ही भूल पाऊं। सोए तो गुलामी की रात में थे लेकिन नींद खुली तो आजादी की सुबह थी। हर कोई आजादी के जश्न में डूबा था। चहुं ओर भारत माता की जय से वातावरण गुंजायमान था। लोग सड़कों पर झूम रहे थे।

आज की तरह तब तिरंगा झंडे इतनी संख्या में नहीं थे, लेकिन जितने भी थे वो लोगों की आन बान और शान थे। एक ही तिरंगा के पीछे हजारों की भीड़ थी। पुरानी किस्से बताते प्रख्यात Historian Prof. Irfan Habib बोले, आजादी के अमृत महोत्सव के तहत जिले भर में निकाली जा रहीं तिरंगा यात्रा आजादी के पहले दिन की याद ताजा कर रही हैं। जिन्होंने आजादी की वो पहली सुबह देखी उनके लिए तो यह पल और भी खास है। प्रस्तुत है Pro. Irfan Habib से बातचीत के प्रमुख अंश...

15 अगस्त 1947 की पहली सुबह अलीगढ़ का माहौल क्या था?

मेरी उम्र 16 साल रही होगी। तब Mohammedan Anglo Oriental College (अब एएमयू) में 11वीं कक्षा में दाखिला लिया था। आजादी की पहली सुबह लाजवाब थी। लोग घरों से निकल आए थे। मैं भी अपने पिता व मां के साथ कार से तिरंगा लेकर शहर में घूमने निकला था। हर तरफ जयकारों की गूंज थी। लोग गले मिल रहे थे। खुशी में पूरा दिन कब बीत गया पता ही नहीं चला।

सबसे ज्यादा जश्न कहां मनाया गया था?

शहर का केंद्र बिंदु रेलवे रोड, महावीर गंज, मदार गेट व बस अड्डा के आसपास का क्षेत्र हुआ करता था। सबसे ज्यादा लोग वहीं एकत्रित हुए। उस दिन सरकार ने अवकाश घोषित कर दिया था। हर कोई आजादी के रंग में डूबा हुआ था। जो माहौल आज है, वैसा ही पहले दिन देखने को मिला।

आजादी मिलने से पहले क्या अंग्रेजी हुकूमत का रुख नरम पड़ गया था?

जून 1948 में ही अंग्रेजों ने एलान कर दिया था कि भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो या न हो, वो 19 जून 1948 के बाद भारत छोड़ देंगे। इससे पहले 1942 में भी अंग्रेजों ने भारत को आजाद करने की बात कही थी। इसके बाद अंग्रेजों सरकार के रुख में बदलाव आ गया था। कलक्टर लोगों से ठीक से व्यवहार करने लगे थे।

देश आजाद होने की जानकारी सुबह मिली थी या रात को?

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के लिए ब्रिटेन से अंतिम वायसराय के रूप में lord mount baton को भारत भेजा था। 14 अगस्त को पाकिस्तान को आजादी मिली। 14 व 15 अगस्त की रात को भारत को आजादी मिली। पं. जवाहर लाल नेहरू ने रात 12 बजे ही देश को रेडियो पर संबोधित किया था। अगली सुबह यानि 15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित किया था।

75 साल में शहर ने क्या बदलाव देखे? पहले क्या प्रसिद्ध था?

शहर की आजाबदी तब 80 हजार थी। शहर अब महानगर हो गया है। रेलवे रोड ही मुख्य बाजार हुआ करता था। राय उमराव की सबसे प्रसिद्ध दुकान थी, जहां घड़ी, जेवर आदि सामान मिला था। नुमाइश तब भी लगती थी। गाय-भैंस का व्यापार होता था। घुड़ दौड़ भी होती थी, अब नहीं होती। मैरिस रोड भी पुराना है। शहर के दौनों भागों को जोड़ने के लिए कठपुला ही एक पुल हुआ करता था। उद्योग व शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में जिले ने आज कीर्तमान हासिल कर लिया है।

दिन भर तिरंगा लेकर घूमे थे शहर में, लाल टोपी वालों के खिलाफ लगाए थे नारे

खैर के मूल निवासी जवाहर लाल जैन के घर जन्मे बनासीदास जैन (90 ) को वो सुबह अब भी याद है। उस समय वह 13 साल के थे। तब वह खिरनी की सराय से सासनीगेट चौराहा के निकट खाली मैदान (इंडियन डाईकास्टिंग व अंजुला भार्गव हास्पिटल) में आरएसएस की शाखा में जाते थे। वे बताते हैं आजादी की जानकारी मिलते ही बच्चों के साथ सड़कों पर निकल पड़े। खिरनीगेट पर अंग्रेजों के दो सिपाही मिल गए। बच्चों ने लाल टोपी मुर्दाबाद के नारे लगाए। एक बच्चे ने तो एक सिपाही को धक्का मार दिया, वे आग बबूला हो गए। हमारे साथी कैलाश चंद्र शर्मा के डंडा मार दिया। हंगामा भी हुआ।

गुड़ बांट मनाया जश्न

हाथरस जिले की तहसील सादाबाद के गांव कुरसंडा के मूल निवासी रघुनंदन दास श्रीवास्तव (हाल निवासी बैंक कालोनी प्रीमियर नगर) अंग्रेजी शासन पटवारी (लेखपाल) थे। वर्ष 1924 में जन्मे श्रीवास्तव के पिता सोहन लाल श्रीवास्तव भी पटवारी थे। वे बताते हैं कि जब उनकी नियुक्ति पटवारी पद पर हुई थी, तब क्रांतिकारियों का जुनून सांतवे आसमां पर था। देश आजाद हुआ तो सबसे ज्यादा खुशी हमारे परिवार को थी। अंग्रेजों की गुलामी की नौकरी से निजात मिली थी। गांव के लोगों ने मिठाई बांटने की मांग की। उस दौर में सादाबाद में लड्डू एक -दो दुकानों पर ही मिलते थे। लड्डू न मिलने पर घर में रखे गुड़ को ही बांटना शुरू कर दिया।

Edited By: Anil Kushwaha