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भारत के पहले आधुनिक हॉस्पिस 'शांति अवेदाना' के 40 साल, दर्द से राहत और सम्मानजनक विदाई की अनूठी कहानियां

Published: Sun, 01 Nov 2026 09:29 AM (IST)

मुंबई में 2 नवंबर 1986 को शुरू हुआ शांति अवेदाना सदन, भारत का पहला आधुनिक हॉस्पिस है। यहां अंतिम चरण ...और पढ़ें

(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

HighLights

  1. शांति अवेदाना सदन: भारत का पहला आधुनिक हॉस्पिस।

  2. 40 वर्षों में 40,000 से अधिक मरीजों की सेवा।

  3. कैंसर मरीजों को मुफ्त उपशामक देखभाल प्रदान करता है।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। मुंबई के बांद्रा स्थित माउंट मेरी चर्च के पास, बेसिलिका के ठीक सामने बनी एक इमारत ने भारत में चिकित्सा सेवा के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा था। 2 नवंबर 1986 को शुरू हुआ 'शांति अवेदाना आश्रम' अब शांति अवेदाना सदन देश का पहला आधुनिक हॉस्पिस है।

शुरुआत के 40 साल पूरे होने पर आज यह संस्थान इस बात का गवाह है कि कैसे इसने मुंबई, दिल्ली और गोवा के अपने केंद्रों के जरिए 40000 से अधिक कैंसर मरीजों की सेवा की है।

आखिर क्यों पड़ी हॉस्पिस की जरूरत?

इसकी शुरुआत की कहानी टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल (TMH) के जाने-माने ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. लुईस जोस डी सूजा, जिन्हें प्यार से 'लुसिटो' कहा जाता है के एक कड़े संकल्प से जुड़ी है। 1970 और 80 के दशक में डॉ. सूजा ने देखा कि अस्पताल आने वाले करीब 75% मरीज कैंसर के अंतिम चरण में होते थे। तमाम इलाजों के बावजूद ज्यादातर मरीज बच नहीं पाते थे।

उस दौर में मरीज रो-रोकर विनती करते थे कि उन्हें घर न भेजा जाए, क्योंकि घर पर उनके जख्मों को साफ करने या उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। तब डॉ. सूजा को महसूस हुआ कि मरीजों को केवल अस्पताल नहीं, बल्कि एक ऐसे घर जैसी जगह की जरूरत है जहां अस्पताल जैसी मेडिकल सुविधा भी मिले और अपनापन भी।

क्या होता है 'पैलिएटिव केयर'?

इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि भारत में तब 'पैलिएटिव केयर' (उपशामक देखभाल) का नाम तक नहीं लोग जानते थे। इसका मुख्य उद्देश्य मरीज के दर्द को कम करना और अंतिम समय में उनके लक्षणों को मैनेज करना है। पहले पैलिएटिव केयर तब दी जाती थी जब इलाज के सारे विकल्प खत्म हो जाते थे, लेकिन आज इसे मुख्य इलाज के साथ ही शुरू कर दिया जाता है। 

अब नाम क्यों बदला गया? इसके पीछे भी एक कहानी है। चूंकि 'आश्रम' शब्द सुनने पर लोगों को लगता था कि यह गरीबों या बेसहारा लोगों का अनाथालय है, इसलिए 2004 में इसका नाम बदलकर 'शांति अवेदाना सदन' कर दिया गया, ताकि लोग इसे मौत की जगह नहीं, बल्कि दर्द से राहत पाने की जगह के रूप में समझ सकें।

'वे इतने अच्छे से देखभाल करते हैं कि मैं हर साल लौटती हूं'

यह संस्था पूरी तरह से दान और जनसहयोग से चलती है, जिसका मासिक खर्च करीब 40 लाख रुपये है। यहां रहने और इलाज का खर्च पूरी तरह मुफ्त है। वर्ष 2003 में अपनी आपबीती साझा करते हुए ज्योत्स्ना आरेकर बताती हैं कि जब उनके 40 साल के पति फेफड़े के कैंसर से पीड़ित थे, तो उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे और तीन छोटे बच्चे थे।

उन्होंने 18 दिन अपने पति के साथ इस हॉस्पिस में बिताए। आज भी हर साल ज्योत्स्ना यहां बिस्कुट, तौलिए और नैपकिन लेकर आभार जताने आती हैं, क्योंकि उनके पति को यहां जो सम्मान और प्यार मिला, उसे वे कभी भूली नहीं हैं।

'सिर्फ दवा नहीं, जिंदगी का अहसास'

होली क्रॉस सिस्टर्स की सिस्टर तारा बताती हैं कि यहां आने वाले हर मरीज का यह मतलब नहीं होता कि वे सिर्फ मौत का इंतजार कर रहे हैं। जो लोग ऐसा सोचते भी हैं, उन्हें खेल, संगीत, कला और काउंसलिंग के जरिए जीवन को खुलकर और आराम से जीने के लिए प्रेरित किया जाता है।

हॉस्पिस के छहों वार्ड इस तरह बनाए गए हैं कि हर मरीज को खिड़की से हरियाली और दूर अरब सागर का खूबसूरत नजारा दिखाई दे, जिससे मन को शांति मिले। यहां मरीजों की सेवा के लिए डॉक्टर, नर्सेस के साथ-साथ कई समर्पित स्वयंसेवक भी अपनी सेवाएं देते हैं।

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