लद्दाख में 2,950 से ज्यादा आवारा कुत्तों की नसबंदी, काले गर्दन वाले सारसों को बचाने के लिए उठाया गया कदम
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने लद्दाख में काले गर्दन वाले सारस के संरक्षण के लिए 2,950 से अधिक आवारा कुत्तों की नसबंदी कराई है।
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काले गर्दन वाले सारस को बचाने के लिए आवारा कुत्तों की नसबंदी
HighLights
BNHS द्वारा लद्दाख में 2950+ आवारा कुत्तों की नसबंदी।
काले गर्दन वाले सारस के संरक्षण हेतु यह महत्वपूर्ण कदम।
आवारा कुत्तों से सारस के अंडों और चूजों को खतरा था।
राज्य ब्यूरो, मुंबई। लद्दाख के राजकीय पक्षी एवं संकटग्रस्त प्रजातीय काले गर्दन वाले सारस के संरक्षण के लिए बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) ने बड़ी पहल करते हुए 2,950 से अधिक आवारा कुत्तों की नसबंदी कराई है।
बीएनएचएस का दावा है कि छुट्टा घूमने वाले कुत्ते सारसों के अंडों और चूजों के लिए गंभीर खतरा बन गए थे, जिसके चलते वर्ष 2022 में भारतीय सेना, पशुपालन विभाग तथा वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण विभाग के सहयोग से यह अभियान शुरू किया गया।
बीएनएचएस के निदेशक किशोर रीठे के अनुसार लद्दाख की अल्पाइन आर्द्रभूमियों में आवारा कुत्तों को काले गर्दन वाले सारस के चूजों का शिकार करते और घोंसला बनाने वाले पक्षियों को परेशान करते हुए देखा गया है। इससे इन दुर्लभ पक्षियों की प्रजनन सफलता प्रभावित हो रही थी।
लद्दाख में काले गर्दन वाले सारसों को बचाने की पहल
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संकटग्रस्त मानी जाने वाली इस प्रजाति की वैश्विक आबादी लगभग 11 से 12 हजार है, जिनमें अधिकांश तिब्बती पठार पर पाई जाती है। भारत में इनकी संख्या 100 से भी कम बताई जाती है।
लद्दाख में इन सारसों के प्रमुख प्रजनन क्षेत्र चांगथांग शीत रेगिस्तान वन्यजीव अभयारण्य, हानले, त्सो कार, न्योमा की आर्द्रभूमियां और आसपास के दलदली क्षेत्र हैं।
हाल के वर्षों में इनका विस्तार सुरु घाटी तक भी देखा गया है। स्थानीय समुदाय काले गर्दन वाले सारस को पवित्र पक्षी और शांति, पवित्रता तथा सौभाग्य का प्रतीक मानता है। वसंत ऋतु में इनके आगमन को नवजीवन और कृषि मौसम की शुरुआत का संकेत माना जाता है।
किशोर रीठे ने बताया कि सारसों के सामने केवल आवारा कुत्तों का ही नहीं, बल्कि मानव बस्तियों के विस्तार, पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि, रैखिक आधारभूत ढांचे के विकास, आवासीय क्षेत्रों के क्षरण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां भी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित खाद्य अपशिष्ट और रसोई के कचरे के कारण आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे वन्यजीवों पर दबाव बढ़ रहा है।
रीठे के अनुसार कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने के साथ-साथ भारतीय सेना की कुछ चौकियों पर खाद्य और रसोई अपशिष्ट प्रबंधन की प्रायोगिक परियोजना भी शुरू की गई है।
इसके अलावा करीब 1,000 सशस्त्र बल कर्मियों को जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है। किशोर रिठे ने बताया कि जून 2026 में किए गए वार्षिक सर्वेक्षण में लद्दाख की आर्द्रभूमियों में काले गर्दन वाले सारस के 19 जोड़े दर्ज किए गए।
वहीं, बीएनएचएस के वैज्ञानिक डॉ. मुहम्मद रजा ने कहा कि कई दुर्गम क्षेत्रों का सर्वेक्षण नहीं हो सका, इसलिए वास्तविक संख्या इससे कुछ अधिक हो सकती है।
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