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सतना के जंगलों में बने आश्रमों पर वन विभाग का शिकंजा, नौ मठाधीशों को थमाया नोटिस; बेदखली तक पहुंच सकती है कार्रवाई

Published: Mon, 26 Oct 2026 10:13 PM (IST)

वन विभाग ने सतना के मझगवां वन परिक्षेत्र में वनभूमि पर बने आश्रमों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। भारतीय ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।

-प्रतीकात्मक चित्र।

HighLights

  1. सतना वन विभाग ने आश्रमों पर कार्रवाई शुरू की।

  2. वनभूमि अतिक्रमण पर नौ मठाधीशों को नोटिस जारी।

  3. तीन मौकों के बाद हो सकती है बेदखली की कार्रवाई।

डिजिटल डेस्क, सतना। जिले के मझगवां वन परिक्षेत्र के सरभंगा क्षेत्र में वनभूमि पर लंबे समय से स्थापित आश्रम अब वन विभाग की कार्रवाई के दायरे में आ गए हैं। विभाग ने भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 80 के तहत कई आश्रमों के मठाधीशों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। इस कार्रवाई से वनक्षेत्र में रहकर तपस्या और साधना करने वाले साधु-संतों के सामने भी असमंजस की स्थिति बन गई है।

वन विभाग का उद्देश्य वनभूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना बताया जा रहा है। वहीं, इस कदम को लेकर क्षेत्र में चर्चा तेज है। खास बात यह है कि सरभंगा के जंगलों में कुछ आश्रम लंबे समय से संचालित हैं, जहां साधु-संत रहकर भजन और तप-साधना करते आ रहे हैं। ऐसे में नोटिस के बाद उनके भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।

नोटिस के बाद तीन मौके, फिर बेदखली की प्रक्रिया

वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, सरभंगा सहित संबंधित क्षेत्रों में आश्रमों और अन्य व्यक्तियों को नोटिस जारी किए गए हैं। उपलब्ध विवरण में महंत हसानंद सरस्वती उर्फ फक्कड़ बाबा सहित कई नामों का उल्लेख है। विभाग ने भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 80 के तहत यह कार्रवाई की है।

नोटिस मिलने के बाद संबंधित पक्षों को वनभूमि खाली करने के लिए स्वयं पहल करने के तीन अवसर दिए जाने की बात कही गई है। इसके बाद भी यदि अतिक्रमण नहीं हटाया जाता है, तो विभाग आगे की बेदखली प्रक्रिया शुरू कर सकता है। अतिक्रमण हटाने के लिए मामला टास्क फोर्स को सौंपे जाने की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है।

हालांकि, अंतिम कार्रवाई संबंधित मामलों की स्थिति और नियमानुसार आगे बढ़ेगी।

वनभूमि को नुकसान की भरपाई का मामला भी उठेगा

वन विभाग वनभूमि पर बने आश्रमों, स्थायी निर्माणों और अन्य ठिकानों से वन संरक्षण एवं संवर्धन को हुए संभावित नुकसान का आकलन कराने की तैयारी में है। विभागीय जानकारी के मुताबिक, नुकसान की भरपाई से जुड़े प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

आगामी 7 और 8 नवंबर को इको कोर्ट लगने की संभावना जताई गई है। ऐसे में वन विभाग इन मामलों को वहां प्रस्तुत कर सकता है। हालांकि, प्रकरणों की सुनवाई और संभावित भरपाई को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

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जंगल के बीच बड़े आश्रम 

सतना वनमंडल के विभिन्न वन परिक्षेत्रों में घने जंगलों के बीच बड़े आश्रम और अन्य निर्माण मौजूद हैं। इस मामले में एक अहम पहलू यह भी सामने आया है कि कुछ निर्माण ऐसी जमीन पर होने की बात कही जा रही है, जिसे वन क्षेत्र के बीच स्थित होने के बावजूद अभिलेखों में वनभूमि से अलग या डिनोटिफाइड बताया जाता है।

ऐसे में जमीन के वास्तविक दर्जे, उसके उपयोग और आश्रमों के निर्माण के लिए दी गई अनुमति की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित भूमि किस श्रेणी में दर्ज है और वहां निर्माण किन नियमों के तहत किए गए। इन सवालों का जवाब राजस्व एवं वन अभिलेखों की जांच से ही मिल सकेगा।

पहले भी कार्रवाई का विरोध, अब फिर बढ़ी चर्चा

वनभूमि से जुड़े अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर क्षेत्र में पहले भी विरोध सामने आ चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, चित्रकूट विधायक और केंद्रीय कृषि मंत्री भी इससे संबंधित कार्रवाई के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके बावजूद वन विभाग द्वारा नोटिस जारी किए जाने से मामला एक बार फिर चर्चा में है।

अब आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित पक्ष नोटिस के जवाब में क्या प्रस्तुत करते हैं और भूमि के दस्तावेजों की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं। वनभूमि संरक्षण, लंबे समय से रह रहे साधु-संतों की स्थिति और जमीन के कानूनी दर्जे से जुड़े सवाल इस पूरे मामले के केंद्र में हैं।

डिप्टी रेंजर द्वारा वनभूमि पर स्थापित आश्रमों आदि को धारा अस्सी के तहत नोटिस दिया गया है। आगे की कार्रवाई जारी है।
- रंजन सिंह परिहार, वनपरिक्षेत्राधिकारी, मझगवां