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रीवा में कागजों पर बन गई पूरी गोशाला, जमीन पर मिली 80 फीट की अधूरी दीवार; 20 लाख का भुगतान डकारने का आरोप

Published: Sun, 18 Oct 2026 05:12 PM (IST)

रीवा में निराश्रित गोवंश के लिए स्वीकृत गोशाला निर्माण में 20.22 लाख रुपये से अधिक के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ ...और पढ़ें

-प्रतीकात्मक चित्र।

-प्रतीकात्मक चित्र।

HighLights

  1. रीवा में गोशाला निर्माण में 20 लाख से अधिक का घोटाला।

  2. EOW ने पांच अधिकारियों और ठेकेदार पर दर्ज की FIR।

  3. मौके पर मिली अधूरी दीवार, अनुपयोगी भवन, नहीं थी गोशाला।

डिजिटल डेस्क, रीवा। निराश्रित गोवंश को आश्रय देने के उद्देश्य से शुरू की गई योजना में ही भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने आया है। प्रदेश के रीवा जिले में गोशाला निर्माण के नाम पर 20.22 लाख रुपये से अधिक की सरकारी राशि निकालने का आरोप है, जबकि मौके पर गोशाला की जगह अधूरी दीवार और अनुपयोगी भवन मिला। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने मामले की जांच के बाद ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (आरईएस) के पांच तत्कालीन अधिकारियों और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

मामला नगर परिषद डभौरा के डभौरा यूनिट-3 में वीबी-जी राम जी योजना के तहत स्वीकृत गोशाला निर्माण कार्य से जुड़ा है। परियोजना की कुल स्वीकृत लागत 37.85 लाख रुपये थी। जांच में सामने आए तथ्यों के मुताबिक, निर्माण के नाम पर पोर्टल पर लाखों रुपये के बिल प्रस्तुत किए गए और भुगतान भी निकाल लिया गया, लेकिन स्वीकृत निर्माण कार्य मौके पर पूरा नहीं मिला।

मौके पर नहीं मिली गोशाला

डभौरा यूनिट-3 में गोशाला के साथ बछड़ा शेड, भूसा गोदाम, बीमार गायों के लिए शेड, नलकूप, छह हजार लीटर क्षमता की पानी की टंकी, बाउंड्रीवॉल और जमीन के समतलीकरण का काम स्वीकृत किया गया था। निर्माण की जिम्मेदारी ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग क्रमांक-2, रीवा को सौंपी गई थी।

शिकायत मिलने के बाद EOW ने जब निर्माण स्थल का भौतिक सत्यापन कराया तो स्वीकृत कार्यों और मौके की स्थिति में बड़ा अंतर मिला। जांच के अनुसार, वहां गोशाला, शेड, नलकूप और पानी की टंकी नहीं मिली। मौके पर केवल 80×25 फीट की अधूरी बाउंड्रीवॉल और एक अपूर्ण भवन मिला, जो उपयोग के लायक नहीं था।

बिना खुली निविदा के पसंदीदा फर्म को ठेका देने का आरोप

ईओडब्ल्यू की जांच में निविदा प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि नियमों के मुताबिक खुली निविदा प्रक्रिया अपनाने के बजाय छतरपुर की मेसर्स दीनदयाल कुशवाहा फर्म को ठेका देने के लिए अधिकारियों और फर्म के बीच मिलीभगत की गई।

जांच में 3 दिसंबर 2020 और 31 दिसंबर 2020 की तारीखों वाली दो अलग-अलग संक्षिप्त निविदाओं को कथित तौर पर फर्जी और कूटरचित बताया गया है। आरोप है कि निविदा शुल्क और अमानत राशि जमा किए बिना ही फर्म को प्रक्रिया में शामिल किया गया।

28 सामग्रियों की जगह सिर्फ 9 का दर पत्रक

नियमों के अनुसार कार्य के लिए 28 सामग्रियों की दरों का विवरण मांगा गया था, लेकिन संबंधित फर्म ने केवल नौ सामग्रियों का अधूरा दर पत्रक प्रस्तुत किया। इसके बावजूद कथित रूप से तुलनात्मक पत्रक तैयार कर फर्म को सबसे कम दर वाली यानी एल-1 घोषित कर दिया गया और कार्यादेश जारी कर दिया गया।

ईओडब्ल्यू के मुताबिक निविदा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के बाद निर्माण कार्य के नाम पर भुगतान लेने का सिलसिला आगे बढ़ा। जांच में सामने आए दस्तावेजों और मौके की स्थिति के बीच अंतर को मामले का अहम आधार माना गया है।

27.38 लाख रुपये के बिल, 20.22 लाख का भुगतान

जांच के अनुसार, संबंधित फर्म और अधिकारियों की मिलीभगत से वीबी-जी राम जी पोर्टल पर कुल 27,38,578.22 रुपये के कथित फर्जी बिल प्रस्तुत किए गए। इनमें से 20,22,020 रुपये का भुगतान भी निकाल लिया गया।

इस तरह, जिस परियोजना के तहत निराश्रित गोवंश के लिए आश्रय और जरूरी सुविधाएं विकसित की जानी थीं, उसके निर्माण में गंभीर अनियमितताओं का आरोप सामने आया है। ईओडब्ल्यू ने इसे सरकारी धन को नुकसान पहुंचाने का मामला मानते हुए आपराधिक प्रकरण दर्ज किया है।

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इनके खिलाफ दर्ज हुआ प्रकरण 

ईओडब्ल्यू ने जांच के बाद छह लोगों को आरोपी बनाया है। इनमें ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के पांच तत्कालीन अधिकारी-कर्मचारी और संबंधित फर्म का प्रोपराइटर शामिल हैं। ईओडब्ल्यू ने राजेन्द्र सिंह धुर्वे तत्कालीन कार्यपालन यंत्री संभाग-1 एवं प्रभारी संभाग-2, डीएस आर्मो तत्कालीन कार्यपालन यंत्री संभाग-2 रीवा, हिमांशु तिवारी तत्कालीन कार्यपालन यंत्री सीधी, जगदीश सिंह राजपूत तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी मऊगंज, लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला तत्कालीन सहायक ग्रेड-3 प्रभारी निविदा शाखा और दीनदयाल कुशवाहा प्रोप्राइटर फर्म को आरोपित बनाया है।