पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बने रिसॉर्ट पर हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को निर्देश- 60 दिन में स्पष्ट करें, जमीन किसकी?
पन्ना टाइगर रिजर्व में एक रिसॉर्ट की भूमि के स्वामित्व विवाद पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कलेक्टर को दो ...और पढ़ें

पीटीआर में बना आलीशान रिसॉर्ट (फाइल फोटो)
HighLights
हाई कोर्ट ने पन्ना टाइगर रिजर्व रिसॉर्ट विवाद पर आदेश दिया।
कलेक्टर को 60 दिन में भूमि स्वामित्व स्पष्ट करने को कहा।
आरोप है कि नियमों का उल्लंघन कर वन भूमि पर बना रिसॉर्ट।
संजय कुमार शर्मा, उमरिया। पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में छतरपुर जिले के राजगढ़ गांव की खसरा नंबर 1841 की करीब पांच एकड़ भूमि पर बनाए गए आलीशान रिसॉर्ट के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कलेक्टर को दो महीनों के भीतर स्थति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। कलेक्टर को यह तय करना है कि भूमि राजस्व विभाग की है या वन विभाग की। इस रिसॉर्ट का निर्माण वर्तमान में हरियाणा के गुरुग्राम में तैनात वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी बी श्रीनिवास कुमार ने कराया है। आरोप है कि पूरा निर्माण नियमों की अनदेखी कर कराया गया है।
न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने बी. श्रीनिवास कुमार एवं अन्य की रिट याचिका का निराकरण करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता सात दिनों के भीतर सभी दस्तावेजों के साथ कलेक्टर के समक्ष नया विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करें। कलेक्टर, याचिकाकर्ता और वन अधिकारियों को सुनवाई का अवसर देने के बाद कानून के अनुसार नया आदेश पारित करेंगे। यह प्रक्रिया अभ्यावेदन प्राप्त होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।
वन भूमि को बताया राजस्व भूमि
मामला वन अधिकारियों द्वारा जारी दो और पांच मई 2026 के नोटिस और 31 जुलाई 2026 को पारित उस आदेश से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता को संबंधित संपत्ति से बेदखल करने का निर्देश दिया गया था। यह कार्रवाई वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 34-ए के तहत की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने हाई कोर्ट को बताया कि जिस भूमि पर निर्माण किया गया है, वह वन भूमि नहीं, बल्कि राजस्व भूमि है और उसका स्वामित्व याचिकाकर्ता के पास है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्होंने कारण बताओ नोटिस के जवाब में वन अधिकारियों के समक्ष संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए थे, लेकिन 31 जुलाई के आदेश में उनके जवाब और दस्तावेजों पर विचार किए जाने का उल्लेख नहीं है। साथ ही उन्हें सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया। इसी आधार पर उन्होंने आदेश को चुनौती दी थी।
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राज्य की तरफ से विरोध नहीं
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने भूमि को राजस्व भूमि बताते हुए पांच अक्टूबर 2025 को ई-मेल के माध्यम से छतरपुर कलेक्टर के समक्ष अभ्यावेदन दिया था, जिस पर अभी तक निर्णय नहीं हुआ था। हाई कोर्ट ने माना कि भूमि की स्थिति का निर्धारण राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। इसके लिए कलेक्टर वन अधिकारियों को भी बुलाकर संपत्ति की वास्तविक स्थिति की जांच कर सकते हैं। राज्य की ओर से याचिकाकर्ता के इस अनुरोध पर कोई आपत्ति नहीं की गई है।
