मां की मौत के बाद नानी कर रही परवरिश, भरण-पोषण की अर्जी पर बच्ची के हक में MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मां की मृत्यु के बाद नानी के पास रह रही नाबालिग बच्ची के भरण-पोषण मामले में ...और पढ़ें

मप्र हाई कोर्ट भवन। (फाइल फोटो)
HighLights
MP हाईकोर्ट ने नानी के भरण-पोषण आवेदन को स्वीकार किया।
कानूनी अभिभावक न होने पर भी भरण-पोषण मांग सकती हैं नानी।
फैमिली कोर्ट को मामला पुनर्विचार के लिए वापस भेजा गया।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मां की मृत्यु के बाद नानी के पास रह रही नाबालिग बच्ची के भरण-पोषण के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस डीडी बंसल की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की ओर से भरण-पोषण की मांग करने वाली नानी को केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि उन्हें बच्ची का विधिवत कानूनी अभिभावक नियुक्त नहीं किया गया है। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण से जुड़े कानून की व्याख्या बच्चों के कल्याण और उन्हें न्याय दिलाने के उद्देश्य से की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें नानी के माध्यम से दायर नाबालिग बच्ची की अंतरिम भरण-पोषण की अर्जी खारिज कर दी गई थी। एकलपीठ ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट भेजते हुए नए सिरे से आदेश पारित करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की मांग सीधे मंजूर नहीं की है।
मां की मौत के बाद नानी के पास रह रही बच्ची
मामला जबलपुर के गोपाल बाग निवासी सविता चौरसिया की नाबालिग नातिन सिद्धि चौरसिया से जुड़ा है। याचिका के अनुसार, सविता की बेटी सपना चौरसिया का विवाह शैलेन्द्र चौरसिया से हुआ था। सपना ने 26 सितंबर 2015 को बेटी सिद्धि को जन्म दिया था। बीमारी के कारण 19 मई 2018 को सपना की मृत्यु हो गई। इसके बाद बच्ची अपनी नानी के साथ रहने लगी, जो उसकी देखभाल और पालन-पोषण कर रही थीं।
याचिका में बताया गया कि बच्ची के पिता ने उसे अपनी बेटी के रूप में स्वीकार नहीं किया और नानी के लिए अकेले उसके पालन-पोषण का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में जनवरी 2019 में नानी के माध्यम से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की मांग की गई। इसमें अंतरिम भरण-पोषण देने की मांग भी शामिल थी।
फैमिली कोर्ट ने इस आधार पर ठुकराई थी याचिका
फैमिली कोर्ट ने 5 सितंबर 2022 को भरण-पोषण की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत का तर्क था कि सविता चौरसिया बच्ची की विधिवत नियुक्त कानूनी अभिभावक नहीं हैं। इसलिए उन्हें पहले कानूनी अभिभावक नियुक्त होने की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की गई। याचिका में दलील दी गई कि मां की मृत्यु के बाद नानी ही बच्ची की देखभाल कर रही हैं और उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे अकेले उसका भरण-पोषण कर सकें। ऐसे में केवल अभिभावक नियुक्त नहीं होने के आधार पर बच्ची को कानूनी राहत मांगने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित कानूनी प्रावधानों और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों पर विचार किया। एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के नागैया बनाम चौदम्मा मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि नाबालिग की ओर से मुकदमा लड़ने वाले व्यक्ति यानी 'नेक्स्ट फ्रेंड' का हिंदू गार्जियनशिप एक्ट के तहत विधिवत नियुक्त अभिभावक होना अनिवार्य नहीं है।
पीठ ने मद्रास, केरल और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्णयों का भी संदर्भ लिया। इन कानूनी सिद्धांतों के आधार पर अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग के प्रति पर्याप्त हित और सरोकार रखने वाला व्यक्ति उसके भरण-पोषण के लिए आवेदन कर सकता है। इसके लिए अभिभावकता से जुड़ी प्रक्रियाओं को हर मामले में अनिवार्य पूर्वशर्त नहीं बनाया जा सकता।
बच्चों के हित में लागू होना चाहिए भरण-पोषण कानून
हाईकोर्ट ने माना कि CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का प्रावधान एक कल्याणकारी व्यवस्था है। इसका उद्देश्य जरूरतमंद और आश्रित व्यक्तियों को आर्थिक सहायता दिलाना है। इसलिए इसकी व्याख्या इस तरह नहीं की जानी चाहिए कि प्रक्रिया संबंधी अड़चनों के कारण किसी असहाय नाबालिग को राहत मांगने के अवसर से वंचित होना पड़े।
पीठ ने यह भी ध्यान में रखा कि बच्ची के पिता के साथ उसका वैध पुत्री का संबंध विवादित नहीं था और मां की मृत्यु के बाद नानी उसकी देखभाल कर रही थीं। ऐसे में केवल नानी के कानूनी अभिभावक नियुक्त नहीं होने के आधार पर आवेदन खारिज करना उचित नहीं था।
फैमिली कोर्ट में नए सिरे से होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है। अब फैमिली कोर्ट को प्रकरण के तथ्यों और कानून के आधार पर दोबारा सुनवाई कर नया आदेश पारित करना होगा।
इस फैसले का अहम संदेश यह है कि नाबालिग के भरण-पोषण के अधिकार पर निर्णय लेते समय केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि बच्चे का हित और कल्याण भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, बच्ची को भरण-पोषण की राशि मिलेगी या नहीं, इस पर अंतिम निर्णय फैमिली कोर्ट की पुनः सुनवाई के बाद ही होगा।
