'इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक का कथन निर्णायक मृत्युपूर्व बयान नहीं', MP हाई कोर्ट का अहम फैसला; FIR की मांग खारिज
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर दर्ज कराने के चरण में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने दिया गया ...और पढ़ें

मप्र हाई कोर्ट भवन। (फाइल फोटो)
HighLights
पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR की मांग वाली याचिका निरस्त।
कोर्ट ने कहा-अनुग्रह राशि देने से पुलिस की भूमिका सिद्ध नहीं।
याचिकाकर्ता मजिस्ट्रेट के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत कर सकती हैं।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि एफआईआर दर्ज कराने की मांग के चरण में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक की ओर से दिया गया कथित बयान अपने आप में निर्णायक रूप से मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने इसी आधार पर पूनम कुशवाहा की याचिका खारिज कर दी। याचिका में पति की मौत के मामले में संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी।
लॉकडाउन में पुलिसकर्मी पर मारपीट का आरोप
याचिकाकर्ता पूनम कुशवाहा का आरोप है कि 16 अप्रैल 2020 को लॉकडाउन के दौरान जबलपुर के गोराबाजार थाने में एक पुलिस अधिकारी ने उनके पति बंशीलाल कुशवाहा के साथ मारपीट की थी। इसके चार दिन बाद 20 अप्रैल को बंशीलाल की मौत हो गई।
पूनम का दावा था कि मौत से पहले बंशीलाल ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने कथित तौर पर उस पुलिस अधिकारी का नाम लिया था। इस दावे के समर्थन में याचिका में फोटो, समाचार पत्रों की कतरनें, मर्ग से संबंधित दस्तावेज और 50 हजार रुपये की अनुग्रह राशि दिए जाने का भी उल्लेख किया गया।
मर्ग जांच में आरोप की पुष्टि नहीं
मामले में मजिस्ट्रेट ने मर्ग जांच के दौरान आरोप की पुष्टि नहीं होने के आधार पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से इन्कार कर दिया था। इसके बाद सत्र अदालत ने भी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। इसी के खिलाफ पूनम ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल अनुग्रह राशि दिए जाने से हत्या या पुलिसकर्मी की भूमिका स्वत: साबित नहीं होती। इसी तरह एफआईआर दर्ज कराने के चरण में मीडिया के सामने दिया गया कथित बयान अपने आप में निर्णायक मृत्यु पूर्व बयान नहीं माना जा सकता।
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मजिस्ट्रेट के सामने साक्ष्य पेश करने की छूट
हाई कोर्ट ने याचिका निरस्त करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध साक्ष्य प्रस्तुत कर सकती हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के तहत धारा 200 और 202 के अंतर्गत आगे की कार्यवाही का रास्ता खुला है।
इस तरह अदालत ने एफआईआर दर्ज कराने की मांग को स्वीकार नहीं किया, लेकिन याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी है।
