MP में मेडिकल यूनिवर्सिटी के विखंडन को हाई कोर्ट में चुनौती: उज्जैन को 64 कॉलेज, जबलपुर के हिस्से में सिर्फ 16; 250 करोड़ के फंड पर भी सवाल
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के पुनर्गठन और उज्जैन में नए धन्वंतरि विश्वविद्यालय बनाने के फैसले को ...और पढ़ें

मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय भवन। (फाइल फोटो)
HighLights
जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के पुनर्गठन को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती।
उज्जैन को 64, जबलपुर को केवल 16 कॉलेज मिलने पर आपत्ति।
250 करोड़ के रिजर्व फंड के हस्तांतरण पर भी सवाल उठाए गए।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (मेडिकल यूनिवर्सिटी), जबलपुर के पुनर्गठन और इसके बड़े हिस्से को अलग कर उज्जैन में नया धन्वंतरि विश्वविद्यालय बनाने के सरकार के फैसले को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिका में 21 अगस्त को राजपत्र में प्रकाशित संशोधन अधिनियम और मध्य प्रदेश धन्वंतरि विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026 की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं डॉ. पीजी नाजपांडे और रजत भार्गव ने प्रस्तावित पुनर्गठन को जबलपुर के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत बताया है।
उज्जैन के हिस्से में छह संभाग, 31 जिले और 64 कॉलेज
याचिका के मुताबिक पुनर्गठन के बाद उज्जैन में बनने वाले नए विश्वविद्यालय के अधीन छह संभाग, 31 जिले और 80 में से 64 कॉलेज चले जाएंगे। इसके विपरीत जबलपुर स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी के पास चार संभाग, 24 जिले और सिर्फ 16 कॉलेज रह जाएंगे।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस तरह का विभाजन समान और न्यायसंगत पुनर्गठन की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इसी आधार पर उन्होंने सरकार के फैसले को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया है।
250 करोड़ के रिजर्व फंड के हस्तांतरण पर भी आपत्ति
याचिका में विश्वविद्यालय के पास मौजूद करीब 250 करोड़ रुपये के रिजर्व फंड को उज्जैन स्थानांतरित किए जाने पर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब नए विश्वविद्यालय की स्थापना और संपत्तियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया ही न्यायिक जांच के दायरे में है, तो रिजर्व फंड को स्थानांतरित करना उचित नहीं है। याचिका में इस राशि के हस्तांतरण पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई है।
विशेषज्ञ अध्ययन और व्यवहार्यता रिपोर्ट नहीं कराने का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि मेडिकल यूनिवर्सिटी के विखंडन से पहले सरकार ने विशेषज्ञ अध्ययन, व्यवहार्यता रिपोर्ट और व्यापक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के पुनर्गठन से संबंधित कैबिनेट नोट, विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और अन्य रिकॉर्ड कोर्ट में पेश कराने की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा। हाई कोर्ट के नोटिस के बाद अब सरकार और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि विश्वविद्यालय के पुनर्गठन को लेकर आगे न्यायालय का रुख क्या रहता है।
