गढ़कालिका के नीचे दफन है उज्जयिनी की 2500 साल पुरानी नगरीय सभ्यता; उत्खनन से खुल सकते हैं कई राज
उज्जैन के गढ़कालिका टीले के नीचे 2500 साल पुरानी उज्जयिनी सभ्यता दफन है, जिसके उत्खनन से कई रहस्य सामने आ ...और पढ़ें

गढ़कालिका माता मंदिर की सुरक्षा के लिए बनाया गया प्राचीन परकोटा। (फोटो- जागरण)
HighLights
गढ़कालिका टीले के नीचे 2500 साल पुरानी सभ्यता।
मिट्टी के घर, लोहे के औजार, विशाल दुर्ग के प्रमाण।
शिप्रा बाढ़ और कालिदास की आराध्य देवी का संबंध।
राजेश वर्मा, उज्जैन। महाकाल की नगरी की धरती में कई सभ्यताएं छिपी हैं। इन्हें सामने लाने के लिए पुराविद यहां नए सिरे से उत्खनन की संभावना तलाश रहे हैं। दरअसल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा पूर्व में किए गए उत्खनन में प्राचीन उज्जयिनी (उज्जैन) की धरती में समाईं सभ्यताएं सामने आ चुकी हैं। शारदीय नवरात्र में गढ़कालिका मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालु जिस टीले पर देवी के दर्शन करते हैं, उसके नीचे ही लगभग 2500 साल पहले की सभ्यता के अवशेष छुपे हैं।
मिट्टी के घर, लोहे के औजार और विशाल दुर्ग
उत्खनन में यहां नगरीय सभ्यता, संस्कृति, विदेशी व्यापार, दस्तकारी, साहित्य से जुड़े प्रमाण मिलते रहे हैं। पहले टीले के नीचे लोग मिट्टी के घरों में रहा करते थे, लोहे के औजारों का उपयोग करते थे और अपनी बस्ती की सुरक्षा के लिए विशाल मिट्टी का दुर्ग बनाते थे। दुर्ग के बाहर चौड़ी खाई थी, जबकि सामान्य आवास किलेबंद क्षेत्र से बाहर बसे थे।
शिप्रा की बाढ़ बनी थी चुनौती?
शिप्रा नदी तब भी यहां थी और आज भी है। उसकी बाढ़ इस प्राचीन नगर के लिए बड़ी चुनौती थी। संभवत: इसी बाढ़ से तब यह सभ्यता टीले के रूप में परिवर्तित हुई, लेकिन गढ़कालिका देवी का मंदिर आज भी टीले पर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। मां गढ़कालिका को महाकवि कालिदास की आराध्य देवी भी माना जाता है।
1950 के दशक की रिपोर्टों में दर्ज है उत्खनन का इतिहास
विक्रम विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं पुराविद डा. रमण सोलंकी के अनुसार, भारतीय पुरातत्व विभाग की 1955-56, 1956-57 और 1957-58 की वार्षिक रिपोर्टों में भी गढ़कालिका टीले के उत्खनन से जुड़े विवरण दर्ज हैं। इनसे तत्कालीन नगर की संरचना और जनजीवन की झलक मिलती है। टीले में ऐसे बहुत से रहस्य छुपे हैं, जिनके बारे में विस्तृत उत्खनन से जाना जा सकता है।
