महाकाल वन का रहस्य गहराया: उज्जैन के पास मिले 2 हजार साल पुराने अवशेष, जमीन के नीचे छिपा हो सकता है प्राचीन मंदिर
उज्जैन के पास सामानेरा और टुकराल गांवों में 2000 साल पुराने पुरातात्विक अवशेष मिले हैं, जो महाकाल वन की प्राचीन ...और पढ़ें

-एआई से निर्मित इमेज।
HighLights
सामानेरा-टुकराल में 2000 साल पुराने अवशेष मिले।
महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं का पता चलेगा।
दबे प्राचीन मंदिर के अवशेषों की संभावना।
धीरज गोमे, उज्जैन। महाकाल वन की प्राचीन सीमाएं कहां तक फैली थीं और इसके प्रवेश द्वार किन क्षेत्रों में रहे होंगे? उज्जैन से करीब 40 किलोमीटर दूर सामानेरा और टुकराल गांवों में मिले पुरातात्विक अवशेष इन सवालों के जवाब तलाशने की नई राह खोल रहे हैं। यहां प्राचीन मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा के खिलौने, शिवलिंग, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और मंदिरों के स्थापत्य खंड मिले हैं। ये अवशेष क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
अवंती-मालवा क्षेत्र विरासत अनुसंधान एवं संरक्षण यात्रा के तहत उज्जैन जिले की तराना, माकड़ौन, उज्जैन और महिदपुर तहसीलों के विभिन्न स्थलों का सर्वेक्षण किया गया। यात्रा के समन्वयक एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा तथा अश्विनी शोध संस्थान के निदेशक और पुरातत्वविद् डॉ. रामचंद्र ठाकुर के अनुसार, सर्वेक्षण में शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए हैं। इनकी व्यवस्थित जांच से प्राचीन उज्जयिनी और महाकाल वन के भौगोलिक विस्तार से जुड़ी नई जानकारियां मिल सकती हैं।
सामानेरा में मिली दुर्लभ संयुक्त देवी प्रतिमा
छोटी कालीसिंध नदी के किनारे बसे सामानेरा में ब्रह्माणी माता मंदिर की दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसे गुप्तकालीन माना जाता है। इसके अलावा यहां करीब दो हजार वर्ष पुराना बताया जाने वाला शिवलिंग, टेराकोटा के खिलौने, प्राचीन मृद्भांड और गुप्तकाल तथा परमारकाल की शिव प्रतिमाएं भी मौजूद हैं।
इन अवशेषों से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों में धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा हो सकता है। हालांकि, महाकाल वन से इन स्थलों के संबंध और उनकी प्राचीन भूमिका को स्पष्ट करने के लिए विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन की जरूरत होगी।
टुकराल में मंदिर के नीचे दबे अवशेषों की संभावना
टुकराल के माता खेड़ा यानी नागदेव मंदिर परिसर में बेसाल्ट पत्थरों के बड़े खंड, प्राचीन स्तंभ और बिना गारे के पत्थरों से बनी परकोटे जैसी संरचना मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार, जिस टीले पर वर्तमान मंदिर स्थित है, उसके नीचे किसी प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे होने की संभावना है। इसकी पुष्टि के लिए वैज्ञानिक जांच और व्यवस्थित पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक होगा।
मंदिर परिसर में हरिहर, नवदुर्गा, गणेश, नागदेवता और गंगा, यमुना तथा सरस्वती की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। ये प्रतिमाएं क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रभाव और उनके सह-अस्तित्व की ओर संकेत करती हैं।
मूर्तियों और स्थापत्य अवशेषों के संरक्षण की जरूरत
सर्वेक्षण से जुड़े विशेषज्ञों ने बिखरी हुई प्रतिमाओं और प्राचीन स्थापत्य खंडों को एकत्र कर सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय और अश्विनी शोध संस्थान की ओर से संगोष्ठी तथा श्रमदान के माध्यम से संरक्षण संबंधी पहल करने की योजना भी सामने आई है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इन स्थलों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, पुरातात्विक अध्ययन और व्यवस्थित संरक्षण किया जाए तो मालवा की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी कई अनसुलझी कड़ियां सामने आ सकती हैं। खासतौर पर महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं, धार्मिक मार्गों और उज्जयिनी के आसपास विकसित हुई सांस्कृतिक परंपराओं को समझने में इन अवशेषों की अहम भूमिका हो सकती है।
सामानेरा और टुकराल के पुरावशेष महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं और मालवा की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन स्थलों का विज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण जरूरी है, ताकि ऐतिहासिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचे।
- प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, कुलानुशासक, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय
