जहां श्रीकृष्ण ने सीखीं 64 कलाएं, उज्जैन की वह धरोहर बताएगी शिक्षा में जीवन मूल्यों का महत्व; 130.75 करोड़ से होगा कायाकल्प
उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि आश्रम का 130.75 करोड़ रुपये की लागत से विकास किया जाएगा, जो सिंहस्थ-2028 से पहले भारतीय ...और पढ़ें

उज्जैन में स्थित सांदीपनि आश्रम।
HighLights
सांदीपनि आश्रम का 130.75 करोड़ रुपये से विकास।
सिंहस्थ-2028 से पहले गुरुकुल परंपरा का प्रदर्शन।
वीआर/एआर तकनीक से कृष्णकालीन शिक्षा का अनुभव।
धीरज गोमे, उज्जैन। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस पावन भूमि पर गुरु सांदीपनि से 64 कलाओं और 16 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया था, वह अब श्रद्धालुओं को भारतीय गुरुकुल परंपरा की झलक भी दिखाएगी। उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि आश्रम को शिक्षा, संस्कार और जीवन मूल्यों की प्राचीन परंपरा से जोड़ने की तैयारी है। सिंहस्थ-2028 से पहले मध्य प्रदेश सरकार यहां 130 करोड़ 75 लाख रुपये की लागत से विकास कार्य कराएगी।
योजना के तहत आश्रम में आधुनिक तकनीक से लैस ऐसा अनुभव क्षेत्र विकसित किया जाएगा, जहां श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करेंगे, बल्कि गुरुकुल की शिक्षा पद्धति को करीब से समझ भी सकेंगे। वर्चुअल रियलिटी (वीआर) और ऑगमेंटेड रियलिटी (एआर) के जरिए प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया जाएगा। वहीं, डिजिटल गैलरी में भगवान श्रीकृष्ण, सुदामा और बलराम के बाल्यकाल से जुड़ी कथाएं अत्याधुनिक लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से दिखाई जाएंगी।
वीआर-एआर तकनीक से जानेंगे कृष्णकालीन गुरुकुल की परंपरा
आश्रम में बनने वाला एक्सपीरियंस जोन पर्यटकों और श्रद्धालुओं को प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था का अनुभव कराने के उद्देश्य से विकसित किया जाएगा। आधुनिक तकनीक के माध्यम से यह समझाने का प्रयास होगा कि उस दौर में शिक्षा किस तरह दी जाती थी और गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी ज्ञान के साथ जीवन जीने की कला कैसे सीखते थे।
डिजिटल गैलरी में कृष्ण, सुदामा और बलराम से जुड़े प्रसंगों को दृश्य-श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा। इससे आश्रम आने वाले लोगों, खासकर नई पीढ़ी, को भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित होने का अवसर मिलेगा।
यह भी पढ़ें- गढ़कालिका के नीचे दफन है उज्जयिनी की 2500 साल पुरानी नगरीय सभ्यता; उत्खनन से खुल सकते हैं कई राज
गोमती कुंड का वैज्ञानिक तरीके से होगा संरक्षण
विकास योजना में आश्रम के ऐतिहासिक गोमती कुंड के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाने का प्रस्ताव है, ताकि कुंड की मूल संरचना और जल को सुरक्षित रखा जा सके।
परिसर के विकास में मालवा की पारंपरिक वास्तुकला को प्राथमिकता देने की योजना है। नक्काशीदार पत्थरों और टेराकोटा के उपयोग से आश्रम को स्थानीय स्थापत्य परंपरा के अनुरूप स्वरूप देने का प्रयास किया जाएगा। इससे धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान भी उभरेगी।
संस्कारों की पाठशाला थी गुरुकुल परंपरा
प्राचीन भारतीय गुरुकुल व्यवस्था में शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान हासिल करना नहीं था। गुरु के मार्गदर्शन में विद्यार्थी विभिन्न विद्याओं और कलाओं के साथ अनुशासन, कर्तव्यबोध, सहअस्तित्व और व्यावहारिक जीवन के जरूरी गुण भी सीखते थे।
महर्षि सांदीपनि आश्रम के प्रस्तावित विकास का उद्देश्य इसी परंपरा को नए स्वरूप में लोगों के सामने लाना है। सिंहस्थ-2028 के पहले होने वाले ये कार्य आश्रम को आस्था और दर्शन के केंद्र के साथ भारतीय ज्ञान, संस्कृति और जीवन मूल्यों को समझने के महत्वपूर्ण स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम होंगे।
