उज्जैन में मोहन भागवत बोले- 'धर्म' और 'रिलीजन' को एक न मानें, धर्म मुक्त करता है; प्रकृति को नुकसान पहुंचाना अधर्म
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने उज्जैन में राष्ट्रीय युवा धर्म संसद का शुभारंभ किया। उन्होंने 'धर्म' और 'रिलीजन' के अंतर ...और पढ़ें

उज्जैन में युवा धर्म संसद के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत। (फोटो- जागरण)
HighLights
मोहन भागवत ने उज्जैन में राष्ट्रीय युवा धर्म संसद का शुभारंभ किया।
'धर्म' को 'रिलीजन' से अलग बताया, कहा यह मुक्ति दिलाता है।
प्रकृति को नुकसान पहुंचाना 'अधर्म', पर्यावरण की रक्षा करना 'धर्म'।
डिजिटल डेस्क, उज्जैन। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में राष्ट्रीय युवा धर्म संसद का विधिवत शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि 'धर्म' की भारतीय समझ पश्चिमी 'रिलीजन' (मजहब) की सोच से अलग है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि देश ने अलग-अलग आस्थाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं किया है और यही धर्मनिरपेक्षता के बारे में उसकी समझ है।
'युवा धर्म संसद' में लगभग 1,700 Gen-Z प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि उन्हें युवाओं को 'धर्म' पर चर्चा करते हुए देखकर खुशी हुई, जबकि कुछ लोग इसे बुज़ुर्गों का मामला मानते हैं।
हमारे देश में लोगों के बीच भेदभाव नहीं
भागवत ने कहा, हमारा देश हमेशा से मिल-जुलकर रहने वाला रहा है। यह अपने लोगों के बीच भेदभाव नहीं करता है। हमारे लिए 'पंथ-निरपेक्षता' का यही अर्थ है। धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा शासकों और धार्मिक अधिकारियों के बीच संघर्ष से पैदा हुई थी और इसलिए यह भारतीय संदर्भ में उसी तरह से लागू नहीं होती है।
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत ने पारंपरिक रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग करने के बजाय एक साथ देखा है। दोनों को एक-दूसरे का पर्यायवाची नहीं माना जाना चाहिए।

बताया 'धर्म' और 'रिलीजन' का फर्क
'धर्म' और 'रिलीजन' (मजहब) के बीच अंतर बताते हुए भागवत ने कहा कि इन दोनों को एक-दूसरे का पर्यायवाची नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'धर्म', 'रिलीजन' से ऊपर है; जहां 'रिलीजन' लोगों को बांधता है, वहीं 'धर्म' आज़ाद करता है और 'मोक्ष' (मुक्ति) की ओर ले जाता है।
उन्होंने 'धर्म' को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया और कहा कि अंग्रेजी भाषा में इस भारतीय अवधारणा के लिए कोई सटीक शब्द नहीं है और ऐतिहासिक रूप से पश्चिमी लोगों को इसे समझाने के लिए 'रिलीजन' शब्द का इस्तेमाल किया गया है।
उन्होंने कहा कि जब 'रिलीजन' को 'धर्म' से अलग किया जाता है तो वह संकीर्ण या सांप्रदायिक हो सकता है। उन्होंने 'धर्म' को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया।
धर्म को पहचानना और पालन करना होता है
भागवत ने कहा, धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे खोजा जाए। इसे पहचानना और इसका पालन करना होता है। उन्होंने 'धर्म' को एक ऐसे सिद्धांत के रूप में वर्णित किया जो ब्रह्मांड को बनाए रखता है। सभी की प्रगति को बढ़ावा देता है और हर जीव व वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए कर्तव्यों को तय करता है।
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युवा प्रतिभागियों से कहा, इसे समझना है तो पूर्वाग्रहों को छोड़ें
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि 'धर्म' इंसानी व्यवहार में झलकता है और उन्होंने युवा प्रतिभागियों से कहा कि अगर वे इसे समझना चाहते हैं, तो उन्हें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा। उन्होंने 'धर्म' को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी से भी जोड़ा और कहा कि इंसानों का फर्ज है कि वे प्रकृति की रक्षा करें। साथ ही, जंगलों को नष्ट करना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना 'अधर्म' है।
पूजा-पाठ के दूसरे तरीकों का सम्मान करें
उन्होंने युवाओं से कहा कि वे अपनी परंपराओं पर अडिग रहते हुए भी पूजा-पाठ के दूसरे तरीकों का सम्मान करें। भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा लोगों को बांटने के बजाय उन्हें जोड़ने की कोशिश करती है और देश ने हमेशा उन लोगों की भी मदद करने की कोशिश की है जो उससे अलग राय रखते थे या जिन्होंने उसे मुश्किलों में डाला।
