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धार में सरकारी स्कूल की बदहाल तस्वीर: जर्जर भवन दो साल से बंद, मंदिर के बरामदे में बैठकर पढ़ने को मजबूर बच्चे

Published: Fri, 11 Sep 2026 05:03 PM (GMT+05:30)

धार जिले के टाणा प्राथमिक विद्यालय में जर्जर भवन के कारण दो साल से बच्चे मंदिर के 8x8 फीट के ...और पढ़ें

बच्चे बरामदे में बैठकर पढ़ने को मजबूर। (फोटो- जागरण)

बच्चे बरामदे में बैठकर पढ़ने को मजबूर। (फोटो- जागरण)

HighLights

  1. टाणा प्राथमिक विद्यालय में बच्चे मंदिर के बरामदे में पढ़ रहे।

  2. जर्जर भवन के कारण स्कूल दो साल से बंद पड़ा है।

  3. शौचालय में क्लास लगने का वीडियो वायरल हुआ था।

डिजिटल डेस्क, इंदौर। सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच धार जिले के एक प्राथमिक विद्यालय की तस्वीर व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। निसरपुर ब्लॉक के लोहारी शिक्षा संकुल अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय टाणा में बच्चों के बैठने के लिए एक कमरा तक नहीं बन सका, जबकि स्कूल परिसर में 12 लाख रुपये की लागत से बाउंड्रीवाल का करीब 95 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।

जर्जर भवन के कारण स्कूल करीब दो साल से बंद पड़ा है। नया अतिरिक्त कक्ष भी समय पर नहीं बन पाया। नतीजा यह है कि कक्षा पहली से पांचवीं तक के 22 बच्चे मंदिर के महज 8×8 फीट के बरामदे में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बारिश हो या तेज धूप, बच्चों की पढ़ाई इसी छोटे से बरामदे में चल रही है।

शौचालय में लगती थी क्लास, वीडियो वायरल हुआ तो मचा हड़कंप

स्कूल में जगह की कमी इस हद तक पहुंच गई कि बच्चों को कुछ समय तक नवनिर्मित शौचालय में बैठाकर पढ़ाया गया। यहीं स्कूल की गतिविधियां संचालित होने और कार्यालय जैसा उपयोग किए जाने का मामला भी सामने आया।

शौचालय में बच्चों की पढ़ाई के वीडियो और फोटो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया। इसके बाद शुक्रवार को विभागीय अधिकारी मौके पर पहुंचे और व्यवस्थाओं की पड़ताल की।

school office in varandah 21415

मंदिर के 8×8 फीट के बरामदे में 22 बच्चों की पढ़ाई

दैनिक जागरण के सहयोगी प्रकाशन नईदुनिया की टीम शुक्रवार सुबह करीब 10.30 बजे ग्राम चिपराटा स्थित प्राथमिक विद्यालय टाणा पहुंची। वायरल वीडियो में जिस शौचालय में बच्चों को पढ़ाते हुए देखा गया था, वह उस समय बंद मिला।

पास ही स्थित भीलट मंदिर के महज 8×8 फीट के बरामदे में 22 बच्चे पढ़ाई करते मिले। इनमें 11 बालक और 11 बालिकाएं शामिल थीं। इतने छोटे स्थान में सभी बच्चों का बैठना ही मुश्किल था, ऐसे में पढ़ाई की गुणवत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

शौचालय का ताला खुला तो अंदर मिलीं किताबें और कुर्सियां

कुछ देर बाद निसरपुर बीईओ, लोहारी संकुल प्रभारी हीरालाल निगवाल और बीआरसी विजय कुमार शुक्ला भी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने शौचालय का ताला खुलवाया तो अंदर का दृश्य भी चौंकाने वाला था।

शौचालय में टेबल-कुर्सियां, पढ़ाई की सामग्री और खेलकूद का सामान रखा हुआ था। यहां तक कि टॉयलेट सीट पर भी सामग्री रखी मिली। इससे स्पष्ट हुआ कि शौचालय का उपयोग केवल स्वच्छता सुविधा के बजाय स्कूल की गतिविधियों और सामान रखने के लिए किया जा रहा था।

निजी मकान में क्लास का प्रस्ताव नहीं चला, आंगनवाड़ी में पहुंचे 45 बच्चे

अधिकारियों ने बच्चों के लिए पास के एक निजी मकान में अस्थायी रूप से स्कूल संचालित करने की व्यवस्था बनाने का प्रयास किया, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

इसके बाद स्कूल के 22 बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र में भेज दिया गया। वहां पहले से आंगनवाड़ी के 23 बच्चे मौजूद थे। यानी एक ही कक्ष में कुल 45 बच्चों को बैठना पड़ा। अब सवाल यह है कि जिस जगह 22 बच्चों के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा था, वहां एक ही कमरे में 45 बच्चों की पढ़ाई कितनी प्रभावी होगी।

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7.93 लाख स्वीकृत, फिर भी नहीं बन पाया कमरा

विद्यालय में अतिरिक्त कक्ष निर्माण के लिए आदर्श ग्राम योजना के तहत वर्ष 2023-24 में 7 लाख 93 हजार रुपये मंजूर किए गए थे। पहली किस्त भी जारी हुई, लेकिन निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका और राशि लैप्स हो गई।

करीब दो साल बाद अब ग्राम पंचायत ने 15 अगस्त के बाद अतिरिक्त कक्ष का निर्माण शुरू कराया है। पंचायत का दावा है कि नया कमरा एक से दो महीने में तैयार कर दिया जाएगा।

पहले बन गई बाउंड्रीवाल 

इस मामले का सबसे बड़ा सवाल स्कूल परिसर की प्राथमिकताओं को लेकर है। वर्ष 2023-24 में ही स्कूल की बाउंड्रीवाल के लिए 12 लाख रुपये स्वीकृत हुए और उसका करीब 95 प्रतिशत काम पूरा भी कर दिया गया।

ग्रामीणों का सवाल है कि जब बच्चों के बैठने के लिए कक्षा कक्ष ही उपलब्ध नहीं था, तो पहले बाउंड्रीवाल का निर्माण क्यों कराया गया। यदि अतिरिक्त कक्ष को प्राथमिकता दी जाती तो शायद 22 बच्चों को दो साल तक मंदिर के छोटे से बरामदे में बैठकर पढ़ाई करने की मजबूरी नहीं झेलनी पड़ती।