छतों में दरार और झड़ रहा दीवार का प्लास्टर... आमिर खान के 'दंगल' वाले कोच अखाड़ा बचाने की लड़ रहे जंग
अर्जुन पुरस्कार विजेता और 'दंगल' फिल्म के कोच कृपा शंकर बिश्नोई इंदौर में अपने मल्हार आश्रम अखाड़े को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित कृपा शंकर बिश्नोई की जंग।
HighLights
कृपा शंकर बिश्नोई इंदौर में अखाड़ा बचाने को संघर्षरत हैं।
मल्हार आश्रम की छत में दरारें, प्लास्टर झड़ रहा है।
खराब सुविधाओं से युवा पहलवान प्रशिक्षण छोड़ रहे हैं।
डिजिटल डेस्क, इंदौर। 2016 में आई फिल्म दंगल में महावीर फोगाट का किरदार निभाने के लिए आमिर खान को ट्रेनिंग देने वाले और अर्जुन पुरस्कार विजेता कृपा शंकर बिश्नोई इन दिनों अपना अखाड़ा बचाने की जंग लड़ रहे हैं। वह युवा टैलेंटेड खिलाड़ियों को ट्रेनिंग सेंटर की खराब हालत से निराश होकर इसे छोड़ने से रोकने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मल्हार आश्रम सेंटर की छत की दरारें मरम्मत न होने के कारण बड़ी हो गई हैं, दीवारों का प्लास्टर झड़ रहा है और हर बारिश के बाद अंदर बनने वाले पानी के जमाव से ट्रेनिंग के सामान के खराब होने का खतरा बना रहता है।
बिल्डिंग की हालत ठीक करने के लिए कर रहे संघर्ष
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 से इंदौर के मल्हार आश्रम में स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) सेंटर में 80 से ज्यादा पहलवान ट्रेनिंग ले रहे हैं। यह सेंटर मुफ्त कोचिंग देता है और बिश्नोई हमेशा चैंपियन पहलवान बनने की चाहत रखने वाले किसी भी व्यक्ति को सिखाने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन जो चीज वह ठीक नहीं कर पा रहे हैं, वह है बिल्डिंग की हालत।
लगातार और भारी बारिश के दिनों में अखाड़े के इस्तेमाल लायक न रहने के कारण सेंटर ने इस साल पास के संदीपनी सरकारी मल्हार आश्रम स्कूल के प्रिंसिपल से संपर्क किया। प्रिंसिपल ने लगभग एक महीने के लिए स्कूल के इस्तेमाल न होने वाले पुराने 'बॉयज एसोसिएशन हॉल' को एक अस्थायी विकल्प के तौर पर खोल दिया। छत से पानी टपकना बिश्नोई की एकमात्र चुनौती नहीं है।
कई चुनौतियों का सामना कर रहे बिश्नोई
SAI सेंटर में कोई चेंजिंग रूम नहीं है और टॉयलेट की हालत बहुत खराब है, जिससे महिला पहलवान सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। उन्हें पास के पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करने या आस-पास के घरों के दरवाजे खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
टूट रहा बिश्नोई का हौसला
18 साल पुराने इस सेंटर में खुलने के बाद से ही कोई आधिकारिक कोच नहीं रहा है। बिश्नोई ने बिना किसी बुनियादी सुविधा या संसाधन के भी उभरते हुए पहलवानों को निस्वार्थ भाव से ट्रेनिंग दी है, लेकिन अब उनका हौसला टूट रहा है। जिस शहर में पारंपरिक अखाड़ों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वाले पहलवानों की कई पीढ़ियां तैयार की हैं, वहीं मल्हार आश्रम का जर्जर होता ट्रेनिंग सेंटर अब बदहाली से मुक्ति का इंतजार कर रहा है।
