बुंदेलखंड से निकला स्वच्छता का प्रेरक मॉडल: खुली नालियां बंद, 225 पंचायतों में भूमिगत ड्रेनेज; टीकमगढ़ को राष्ट्रीय सैनिटेशन अवार्ड
टीकमगढ़ जिले ने जलसंकट वाले बुंदेलखंड में स्वच्छता का अनूठा मॉडल प्रस्तुत किया है, जहां भूमिगत ड्रेनेज और ग्रे-वाटर प्रबंधन ...और पढ़ें

फिक्की फेडरेशन हाउस में सम्मान प्राप्त करते हुए टीकमगढ़ कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय (काले कोट में)। ।सौजन्यः जिला प्रशासन)
HighLights
टीकमगढ़ को भूमिगत ड्रेनेज मॉडल के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
जिले की 70% पंचायतों में ग्रे-वाटर प्रबंधन लागू किया गया।
खुली नालियों की समस्या खत्म, ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता सुधरी।
मनीष असाटी, टीकमगढ़। जलसंकट और पिछड़ेपन के लिए पहचाने जाने वाले बुंदेलखंड से अब स्वच्छता का ऐसा मॉडल सामने आया है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। घरों से निकलने वाले गंदे पानी (ग्रे-वाटर) की समस्या को टीकमगढ़ जिले के बड़े हिस्से में ठीक कर दिया गया है।
ग्राम पंचायतों में लागू भूमिगत ड्रेनेज और ग्रे-वाटर प्रबंधन मॉडल के लिए टीकमगढ़ को आईएससी (इंडिया सैनिटेशन कोएलिशन) -फिक्की सैनिटेशन अवार्ड-2026 से सम्मानित किया गया। मंगलवार को नई दिल्ली में इंडिया सैनिटेशन कान्क्लेव में कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने यह पुरस्कार प्राप्त किया। इस नवाचार को आईएससी राष्ट्रीय पत्रिका में केस स्टडी के रूप में भी प्रकाशित किया जाएगा।
गंदे पानी से समाधान तक, 70 प्रतिशत पंचायतों में बदली व्यवस्था
टीकमगढ़ जिले में कुल 324 ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें से 225 यानी 70 प्रतिशत पंचायतों में भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया जा चुका है। जिला प्रशासन का लक्ष्य अगले तीन माह में सभी पंचायतों में इस व्यवस्था को लागू करना है। सभी ग्राम पंचायतों में यह मॉडल अपनाने के संबंध में प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं। अब पंचायतों में नई खुली नालियां बनाने पर रोक है।
इस मॉडल में घरों के बाहर सिल्ट चैंबर बनाए जाते हैं, जिन्हें आठ इंच के पाइप के माध्यम से भूमिगत रूप से आपस में जोड़ा जाता है। अंतिम बिंदु पर लीच पिट के माध्यम से पानी का निष्पादन किया जाता है। जहां संभव है, वहां थ्री-स्टेज फिल्टर के माध्यम से ग्रे-वाटर का उपचार कर उसके पुन: उपयोग पर भी काम किया जा रहा है।
चंद्रपुरा से शुरू हुआ बदलाव, पूरे जिले ने अपनाया
इस बदलाव की शुरुआत चंद्रपुरा ग्राम पंचायत के चैंबर आधारित भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम से हुई। करीब तीन साल पहले यहां की सरपंच वेदैही संजीव पाठक ने यह पहल की। पहले गांवों में खुली नालियां चोक होने, उनमें कचरा जमा होने और गंदे पानी के कारण जलभराव जैसी समस्याएं आम थीं। कई बार नाली के पानी को लेकर पड़ोसियों के विवाद थाने तक पहुंच जाते थे।
चंद्रपुरा में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए तो दूसरे गांवों ने भी इसे अपनाना शुरू किया। बल्देवगढ़ के बड़ाघाट में महिलाओं ने बताया कि पहले मंदिर जाने के लिए उन्हें कीचड़ और गंदे पानी से होकर गुजरना पड़ता था। अब यह समस्या खत्म हो गई है।
जुड़ावन के सगरवारा जैसे गांवों में साफ गलियों के कारण ग्रामीण अपने घरों के बाहर रंगोली तक सजाने लगे हैं। घरों के बाहर बने चैंबर की सफाई ग्रामीण स्वयं कर सकते हैं। इस व्यवस्था के रखरखाव में समुदाय की भागीदारी भी बढ़ी है।
संकरी गलियों और जलभराव वाले क्षेत्रों में भी कारगर
भूमिगत व्यवस्था से खुली नालियों में जमा होने वाली पॉलीथिन, कचरे और भारी गाद की समस्या कम होती है। संकरी गलियों में जहां खुली नाली के लिए जगह नहीं होती, वहां यह व्यवस्था उपयोगी साबित हो रही है। अधिक ढलान वाली सड़कों पर भी इसे प्रभावी विकल्प माना जा रहा है। इससे मच्छरजनित बीमारियों के नियंत्रण, स्वच्छता और ग्रामीणों के स्वास्थ्य स्तर में सुधार की उम्मीद है।
निर्माण से आगे, सोच में आया बदलाव
इस मॉडल की विशेषता केवल भूमिगत पाइप और चैंबर बनाना नहीं है। पंचायतों ने यह सोच बदली है कि सरकारी राशि से ऐसा निर्माण हो जिसका वास्तविक लाभ ग्रामीणों को मिले। प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन के बाद पंचायतों ने इसे अपनाया।
एक ओर जहां अन्य जिलों की ग्राम पंचायतें 15वें वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग और पंचायत स्तर की निधियों का उपयोग खुली नालियों के निर्माण, भवन निर्माण और सामग्री खरीद में करती रहीं। वहीं टीकमगढ़ की ग्राम पंचायतों के सरपंचों ने भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम में यह राशि खर्च की।
यह पहल केवल ड्रेनेज निर्माण की नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता सुधारने की भी है। ग्रामीण अपने घरों के बाहर बने चैंबर के रखरखाव के प्रति अधिक जिम्मेदार बने हैं।
- विवेक श्रोत्रिय, कलेक्टर, टीकमगढ़
