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45 साल पहले बने डकैती-रोधी कानून पर मध्य प्रदेश HC ने उठाए सवाल, सरकार से मांगा जवाब

Published: Sun, 13 Sep 2026 11:38 AM (IST)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने 45 साल पुराने डकैती-रोधी कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने चार हफ्तों में जवाब मांगा है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट। (फाइल फोटो।)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने 45 साल पुराने डकैती कानून पर सवाल उठाए।

  2. राज्य सरकार से कानून की संवैधानिक वैधता पर जवाब मांगा है।

  3. पूर्व गृह मंत्री गोविंद सिंह की याचिका पर सुनवाई हुई।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने डकैती और अपहरण से निपटने के लिए 45 साल पहले बने एक कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि इस कानून को क्यों न रद कर दिया जाए।

राज्य के पूर्व गृह मंत्री गोविंद सिंह की दायर पीआईएल पर कार्रवाई करते हुए हाई कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह), डीजीपी और छह जिलों (ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना और श्योपुर) के एसपी को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है।

याचिका में कानून को दी गई चुनौती

याचिका में एमपी डकैती और अपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम को चुनौती दी गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि जिन हालात की वजह से यह कानून बनाया गया था, वे अब नहीं रहे और इसके प्रावधानों का इस्तेमाल अब संगठित डकैती से असंबंधित मामलों में किया जा रहा है।

यह कानून अक्टूबर 1981 में ग्वालियर-चंबल क्षेत्र और सतना, पन्ना व चित्रकूट के कुछ हिस्सों के बीहड़ों और जंगलों में बड़े पैमाने पर डकैती, अपहरण और हत्याओं के बीच लागू हुआ था। इसमें कड़ी सजी और विशेष अदालतों में मुकदमे चलाने का प्रावधान है।

अदालत में क्या तर्क दिया गया?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संगठित डकैत गिरोहों से निपटने के लिए बने कानून को बनाए रखना तब मुश्किल है जब सरकार ने खुद माना है कि कोई भी लिस्टेड डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि 2020 और 2036 के बीच इस कानून के तहत 1,000 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गईं, जबकि राज्य ने बार-बार सदन को बताया था कि उसके जंगलों में कोई भी लिस्टेड डकैत गिरोह काम नहीं कर रहा है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस कानून की धारा 11 और 13 का इस्तेमाल आपसी दुश्मनी, संपत्ति के विवाद और मामूली झगड़ों के मामलों में किया जा रहा है, जिससे आरोपियों को अग्रिम जमानत नहीं मिल पा रही है और उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। राज्य का कहना है कि यह कानून डकैती से निपटने के लिए एक विशेष उपाय के तौर पर बनाया गया था और अभी भी लागू है।

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