विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

पिता से तलाक के बाद मां के साथ रहने से नहीं छिनता बेटे का संपत्ति में अधिकार; ग्वालियर हाईकोर्ट का अहम फैसला, बताई मुस्लिम वसीयत की सीमा

Published: Fri, 10 Apr 2026 09:25 PM (IST)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि कोई ...और पढ़ें

मप्र हाईकोर्ट ग्वालियर खंडपीठ (फाइल फोटो)

मप्र हाईकोर्ट ग्वालियर खंडपीठ (फाइल फोटो)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

डिजिटल डेस्क, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की अहम व्याख्या करते हुए बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति के एक-तिहाई हिस्से से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता, जब तक बाकी वैध वारिस स्पष्ट सहमति न दें। यह सिद्धांत मुस्लिम पर्सनल लॉ की स्थापित व्याख्या से मेल खाता है।

भाइयों में जमीन को लेकर था विवाद

यह पूरा मामला ग्वालियर में 5280 वर्गफीट जमीन को लेकर दो भाइयों के बीच विवाद का है। पिता के निधन के बाद एक भाई ने दावा किया कि पूरी जमीन उसके नाम वसीयत की गई थी। उसका कहना था कि दूसरा भाई माता-पिता के तलाक के बाद मां के साथ रहने लगा था, इसलिए पिता की संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं है। हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट की कानूनी स्थिति

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता से तलाक के बाद मां के साथ रहने या माता-पिता के तलाक के बाद भी बेटे का अपने जैविक पिता की संपत्ति पर वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता। मुस्लिम कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे बेटे को विरासत से बेदखल माना जाए। कोर्ट ने फैसले में यह भी कहा कि कर्ज और अंतिम संस्कार के खर्च के बाद बची संपत्ति का सिर्फ 33.3 प्रतिशत हिस्सा ही वसीयत किया जा सकता है। यदि इससे अधिक हिस्से की वसीयत की जाती है, तो वह तभी मान्य होगी जब बाकी सभी वारिस लिखित या स्पष्ट सहमति दें।

यह भी पढ़ें- 'उचित मुआवजा दो या जला दो’: केन-बेतवा परियोजना पर आदिवासी महिलाओं ने चिता पर लेटकर किया उग्र प्रदर्शन

ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी वारिस का चुप रहना सहमति नहीं माना जाएगा। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पहले ही पूरी संपत्ति की वसीयत को अमान्य मानते हुए दोनों भाइयों का 50-50 प्रतिशत हक तय किया था। वर्ष 2007 के इस आदेश को चुनौती देते हुए एक भाई ने हाई कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन आठ अप्रैल को ग्वालियर खंडपीठ ने अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।