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हस्तशिल्प कलाओं को संरक्षित करने के लिए कपड़ा मंत्रालय की विशेष पहल, निफ्ट के विद्यार्थियों के साथ चलाया ये अभियान

देश की समृद्ध हथकरघा और हस्तशिल्प कलाओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय ने अहम कदम उठाया है जिसके तहत देश में सभी 18 एनआईएफटी को प्रोजेक्ट दिए जा रहे हैं। इसके तहत सैकड़ों वर्ष पुरानी विधाओं से परिधान तैयार करने के साथ विद्यार्थी विधि का दस्तावेजीकरण भी कर रहे हैं। इसके लिए खास डीसीएच प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।

By Jagran News Edited By: Sachin Pandey Sun, 16 Jun 2024 08:00 PM (IST)
मंत्रालय का एक कदम धीरे-धीरे बड़े बदलाव का माध्यम बन रहा है। (File Photo)

प्रशांत व्यास, भोपाल। देश की समृद्ध हथकरघा और हस्तशिल्प कलाओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय का एक कदम धीरे-धीरे बड़े बदलाव का माध्यम बन रहा है। पारंपरिक कलाओं के संरक्षण के लिए कपड़ा मंत्रालय ने राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) के विद्यार्थियों को साथ लिया है। इसके तहत देशभर के निफ्ट से चुनिंदा विद्यार्थियों को ऐसी कलाओं पर आधारित परिधान तैयार करने प्रोजेक्ट आवंटित किए जा रहे हैं, जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। प्रोजेक्ट डीसीएच (डेवलपमेंट कमिश्नर हैंडीक्राफ्ट्स, हैंडलूम) के तहत पिछले पांच वर्षों में 50 से अधिक कलाओं का संरक्षण और दस्तावेजीकरण किया जा चुका है।

सुरक्षित किए जा रहे कलाओं के नमूने, दस्तावेज

कपड़ा मंत्रालय द्वारा 2019 से शुरू किए गए डीसीएच प्रोजेक्ट के तहत प्रत्येक निफ्ट से प्रतिवर्ष 10 से 15 विद्यार्थियों का चयन किया जाता है। इसी के तहत निफ्ट भोपाल के टैक्सटाइल विभाग के अंतिम वर्ष की तीन छात्राओं का चयन हुआ है। इन छात्राओं ने तीन से चार महीने तक गांव-गांव जाकर ऐसी कलाओं के उपयोग से परिधान तैयार किए हैं। कलाओं के नमूनों के रूप में यह परिधान और प्रोजेक्ट कपड़ा मंत्रालय में संग्रहित किए जाएंगे और समय-समय पर कार्यशालाओं तथा प्रदर्शनी में प्रदर्शित किए जाएंगे ताकि नई पीढ़ी के कलाकार भी इन विधाओं से रुबरु हो सकें।

ऐसे किया जाता है काम

कपड़ा मंत्रालय द्वारा यह प्रोजेक्ट वर्ष 2019 में देशभर के कुल 18 निफ्ट के छात्रों के लिए शुरु किया गया था। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत लुप्त होती हथकरघा एवं हस्तशिल्प कलाओं की शैलियों की सूची विद्यार्थियों को प्रदान की जाती है। प्रत्येक विद्यार्थी इनमें से किसी एक पर प्रस्ताव तैयार कर मंत्रालय भेजता हैं, जिनमें से उस वर्ष देशभर के निफ्ट से आए करीब 10 से 15 प्रस्तावों को ही स्वीकृत किया जाता है। ऐसे में पिछले पांच वर्षों में 50 से अधिक लुप्त होती विधाओं का डाक्यूमेंटेशन कर सहेजा गया है।

महू की स्मकिंग एम्ब्रायडरी

19वीं सदी में ब्रिटिश और फ्रेंच ननों द्वारा एमपी के महू में स्मकिंग एम्ब्रायडरी आर्ट विकसित की गई थी। तेजी से विल्पुत होती इस कला पर निफ्ट की छात्रा आशी गोयल काम कर रही हैं। आशी बताती हैं कि जनजातीय महिलाओं को नन्स ने यह कला सिखाई थी। प्रसिद्धि मिलने पर इसी कला के सहारे यहां के लोगों का जीवन-यापन होता था। स्मकिंग एम्ब्रायडरी का कार्य मुख्यत: कॉटन की फ्रॉक और गाउन पर किया जाता है। इसे कपड़े पर उतारने में बेहद समय लगता है, इसीलिए कलाकारों ने धीरे -धीरे इससे दूरी बना ली है। उन्होंने कहा कि मैंने यहां करीब तीन महीने रिसर्च की और पारंपरगत रुप से यह काम करने वाले परिवारों से मिली। दो कलेक्शन तैयार करने के साथ रिसर्च पेपर तैयार किया है, जिसे जल्द ही मंत्रालय को भेजा जाएगा।

नवाब परिवार पहनता था अवध जामदानी के परिधान

सैकड़ों वर्ष पहले ढाका से शुरू हुई जामदानी हथकरघा कला का एक रुप अवध जामदानी सिर्फ अब इतिहास बनकर रह गई है। इसके अंतिम अधिकृत कलाकार अली अहमद थे, जिनका कुछ वर्ष पहले निधन हो चुका है। इसके संवर्धन के लिए कार्य कर रहीं श्रुतिलता भास्कर बताती हैं कि 18वीं शताब्दी में अवध के नवाब सआदत अली खान के शासनकाल में यह बुनकर कला विकसित हुई थी। टांडा में अवध के नवाब और बेगम इन परिधानों को पहना करते थे। फैशन डिजाइनर पुपुल जैकर ने 1970 में टांडा के आखिरी बुनकर अली अहमद को बनारस में बुलाकर इसके दो कलेक्शन तैयार करवाए, जो आज भी वहां वीविंग सर्विस सेंटर (डब्ल्यू एससी) में साड़ियों में संग्रहित हैं। मैंने अली अहमद के बेटे कलीम और बनारस के दो बुनकरों से इसकी तकनीक के बारे में विस्तार से जानकर ड्रेस तैयार की हैं।

फर्रूखाबाद की जरी-जरदौजी से कलाकारों ने फेरा मुंह

फर्रूखाबाद की जरी-जरदौजी भी शिल्पकारों की कमी के चलते अपने अस्तित्व को खोती जा रही है। निफ्ट की साबी निकोटिया बताती हैं, कि पारंपरिक रूप से जरी-जरदौजी का काम करने वाले कलाकारों ने इस कला से मुंह मोड़ लिया है। कारण है फर्रूखाबाद की जरदौजी गहनता से की जाती है और जितना समय इसमें लगता है कलाकारों को उतना मेहनताना नहीं मिल पाता है। इससे स्वास्थ्यगत समस्याएं भी सामने आती हैं। कलाकारों को आंखों में समस्या होती है। फर्रूखाबाद में करीब दो महीने बिताकर उसके इतिहास से लेकर वर्तमान पर एक रिसर्च पेपर तथा पारंपरिक तकनीक का उपयोग कर तीन कलेक्शन तैयार किए गए हैं।