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माचिस की डिबिया जितनी 350 पन्नों की गीता! टीकमगढ़ में पूर्व विधायक ने सहेजकर रखी है 130 साल पुरानी दुर्लभ प्रति

By Manish AsatiEdited By: Ravindra Soni
Published: Tue, 06 Oct 2026 07:59 PM (IST)

टीकमगढ़ में ज्ञान भारतम् अभियान के तहत 130 साल पुरानी, माचिस की डिबिया जितनी छोटी श्रीमद्भगवद्गीता की एक दुर्लभ मुद्रित ...और पढ़ें

माचिस के आकार की 130 वर्ष पुरानी दुर्लभ मुद्रित श्रीमद्भगवद्गीता।  (फोटो- जागरण)

माचिस के आकार की 130 वर्ष पुरानी दुर्लभ मुद्रित श्रीमद्भगवद्गीता।  (फोटो- जागरण)

HighLights

  1. टीकमगढ़ में 130 साल पुरानी लघु श्रीमद्भगवद्गीता मिली।

  2. माचिस की डिबिया जितनी छोटी, 350 पृष्ठों की मुद्रित प्रति।

  3. प्राचीन भारतीय मुद्रण कला का अद्भुत और दुर्लभ नमूना।

मनीष असाटी, टीकमगढ़। ज्ञान भारतम् अभियान में टीकमगढ़ जिले के खरगापुर से भारतीय धार्मिक और मुद्रण इतिहास से जुड़ी एक बेहद असाधारण धरोहर सामने आई है। पूर्व विधायक एवं भाजपा नेता सुरेंद्र प्रताप सिंह (बेबी राजा) के पास लगभग 130 वर्ष पूर्व मुद्रित श्रीमद्भगवद्गीता की लघु आकार की एक प्रति मिली है। महज 4×4.4 सेंटीमीटर आकार और करीब 350 पृष्ठों वाली इस गीता का स्वरूप एक सामान्य माचिस की डिबिया जितना है।

हैरान करने वाली बारीक प्रिंटिंग

कमाल की बात यह है कि यह श्रीमद्भगवद्गीता हस्तलिखित प्रति न होकर पूरी तरह से मुद्रित है। ऐसे में, सवा सौ वर्ष पहले फिक्स फांट का प्रयोग कर इतने छोटे आकार में साढ़े तीन सौ पन्नों की पुस्तक प्रकाशित करना प्राचीन मुद्रण शिल्प का बेजोड़ नमूना है। इसमें शुरुआती पृष्ठों पर गीता माहात्म्य के बाद वुडकट शैली के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथ का अत्यंत बारीक चित्र उकेरा गया है।

श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व 

इतिहासकारों के अनुसार, उस दौर में ऐसी लघु पुस्तकें श्रद्धालुओं के लिए विशेष उपयोगी होती थीं, जिन्हें आसानी से जेब में रखा जा सकता था या आस्था के चलते ताबीज में भरकर आध्यात्मिक सुरक्षा कवच के रूप में धारण किया जाता था।

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बुंदेलखंड की मुद्रण कला का नायाब नमूना

ज्ञान भारतम अभियान के अंतर्गत टीकमगढ़ में पांडुलिपियों को एकत्र करने में विशेष रुचि ले रहे कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय का कहना है कि विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक इस प्रकार की अन्य कोई दुर्लभ लघु श्रीमद्भगवद्गीता सामने नहीं आई है। ऐसे में, यह बुंदेलखंड के प्राचीन मुद्रण इतिहास, पुस्तक संस्कृति और धार्मिक साहित्यों के प्रसार पर नए ऐतिहासिक तथ्य सामने ला सकती है।