MP में हिंदी में इंजीनियरिंग पढ़ाई का सपना अधूरा, माध्यम में फंसा 'तकनीकी' पेंच, 3 साल में मिले महज 313 छात्र
मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग शिक्षा की पहल छात्रों के अपेक्षित समर्थन और तैयारियों की कमी के कारण ...और पढ़ें

इंजीनियरिंग की पढ़ाई। (प्रतीकात्मक चित्र)

समय कम है?
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अंजली राय, भोपाल। मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग शिक्षा को बढ़ावा देने की पहल अब ठहराव का शिकार होती नजर आ रही है। बड़े स्तर पर शुरू किए गए इस प्रयोग को छात्रों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया, जिसके चलते इसकी राह लगातार मुश्किल होती जा रही है।
सत्र 2022-23 से शुरू हुई इस योजना के तहत प्रदेश के 150 इंजीनियरिंग कॉलेजों में से चार संस्थानों में हर साल 224 सीटों पर हिंदी माध्यम से इंजीनियर तैयार करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन आंकड़े इस योजना की हकीकत बयां कर रहे हैं—तीन वर्षों में महज 313 छात्रों ने ही इस माध्यम को चुना।
भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस पहल को अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) की मंजूरी भी मिली थी। इसके बावजूद प्रदेश का कोई भी सरकारी या निजी कॉलेज इसे पूरी तरह लागू नहीं कर सका। यहां तक कि राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (UIT) में भी अब तक हिंदी माध्यम का पाठ्यक्रम शुरू नहीं हो पाया है।
तैयारियों की कमी बनी बड़ी बाधा
विशेषज्ञों और प्राध्यापकों का मानना है कि हिंदी में इंजीनियरिंग शुरू करने से पहले जरूरी शैक्षणिक ढांचा तैयार नहीं किया गया। पाठ्यक्रम, विषय विशेषज्ञ प्राध्यापक और तकनीकी शब्दावली की कमी ने इस योजना को कमजोर कर दिया। यही वजह है कि हर साल दाखिले के आंकड़े उम्मीद से काफी नीचे रहे।
2022 में 19 प्रवेश
2023 में 90 प्रवेश
2024 में 104 प्रवेश
2025 में 97 प्रवेश
वर्तमान सत्र में करीब 100 छात्र
किताबों का अनुवाद अधूरा
AICTE ने इंजीनियरिंग की 81 किताबों को हिंदी में अनुवाद करने की जिम्मेदारी RGPV को सौंपी थी, लेकिन यह काम अब तक पूरा नहीं हो सका। इससे छात्रों को अध्ययन सामग्री की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है।
इंदौर का एक कॉलेज बना अपवाद
इंदौर स्थित एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च ने कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग (इंडियन लैंग्वेज) को हिंदी में शुरू किया है। यहां 75 सीटों के मुकाबले 78 छात्रों ने दाखिला लिया, जिसमें तीन सीटें ट्यूशन फीस वेवर (TFW) योजना के तहत समायोजित की गईं।
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हिंदी में तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य सराहनीय जरूर है, लेकिन जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी, अधूरी तैयारी और सीमित विकल्पों ने इस पहल को कमजोर बना दिया है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह महत्वाकांक्षी योजना कागजों तक ही सिमट सकती है।
हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वालों की संख्या बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। फैकल्टी की कमी को पूरा कर रहे हैं। पुस्तकें भी तैयार कर रहे हैं।
- इंदर सिंह परमार, उच्च व तकनीकी शिक्षा मंत्री, मप्र शासन
