रावण की ससुराल में कुबेर का दरबार... धनतेरस पर MP के इस नगर में लगता है भक्तों का मेला
मंदसौर के खिलचीपुरा स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर में भगवान कुबेर शिव पंचायत में विराजमान हैं। यह केदारनाथ के बाद ...और पढ़ें

धौलागढ़ महादेव मंदिर के गर्भगृह में विराजित कुबेरदेव व प्राचीन मंदिर।
HighLights
मंदसौर में शिव पंचायत में विराजमान हैं भगवान कुबेर।
धनतेरस पर धौलागढ़ महादेव मंदिर में विशेष अनुष्ठान होते हैं।
सातवीं शताब्दी की कुबेर प्रतिमा का पुरातात्विक महत्व।
डिजिटल डेस्क, मंदसौर। धनतेरस पर हर घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की कामना के साथ भगवान कुबेर की पूजा होगी, लेकिन मध्य प्रदेश के मंदसौर में आस्था का एक ऐसा दरबार सजेगा, जहां धन के देवता स्वयं भगवान शिव की पंचायत में विराजमान हैं। मान्यता है कि देश में केवल दो स्थान ऐसे हैं, जहां शिव पंचायत में भगवान कुबेर को स्थान मिला है। पहला केदारनाथ धाम और दूसरा मंदसौर का खिलचीपुरा स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर। यही वजह है कि धनतेरस पर यहां दर्शन के लिए आस्था उमड़ती है।
दिनभर होंगे धार्मिक अनुष्ठान
धनतेरस पर छह नवंबर को मंदिर में सुबह चार बजे से ही धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाएंगे। ब्रह्म मुहूर्त में भगवान का महाभिषेक किया जाएगा। इसके बाद विशेष पूजन और आकर्षक श्रृंगार होगा। हवन के साथ दिनभर धार्मिक आयोजन चलेंगे। सुबह से मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की कतार देर रात तक लगे रहने की संभावना है। रात्रि में हवन की पूर्णाहुति के साथ विशेष अनुष्ठान संपन्न होंगे।
विश्वविख्यात श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर खिलचीपुरा में स्थित यह मंदिर अपनी प्राचीनता और विशिष्ट मान्यता के कारण अलग पहचान रखता है। धनतेरस के दिन यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान कुबेर के दर्शन कर सुख-समृद्धि और आर्थिक उन्नति का आशीर्वाद मांगते हैं।

सातवीं शताब्दी की है कुबेर प्रतिमा
मंदिर की खासियत केवल इसकी धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि इसका पुरातात्विक महत्व भी है। पुरातत्व विभाग के डा. कैलाश शर्मा के अनुसार, श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना है, जबकि यहां स्थापित भगवान कुबेर की प्रतिमा उत्तर गुप्तकाल की यानी सातवीं शताब्दी की मानी जाती है। मराठाकाल में मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार के दौरान इस प्रतिमा को गर्भगृह में स्थापित किया गया था।
करीब तीन फीट ऊंची इस प्रतिमा में भगवान कुबेर बड़े उदर और चार भुजाओं के साथ नेवले पर विराजमान हैं। उनके एक हाथ में धन की थैली और दूसरे में प्याला है। मंदिर में भगवान गणेश और माता पार्वती की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। वर्ष 1978 में इस प्रतिमा की भगवान कुबेर के रूप में पहचान हुई थी।
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संरचना में बदलाव की मनाही
धौलागढ़ महादेव मंदिर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि यह मंदिर उड़कर यहां आया था। इसकी कोई नींव नहीं है। प्राचीन और पुरातात्विक महत्व का होने के कारण मंदिर की मूल संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता। मराठाकाल में इसका जीर्णोद्धार कराया गया था।
इस तरह यहां आस्था के साथ इतिहास और पुरातत्व की विरासत भी जुड़ी हुई है। धनतेरस पर कुबेर के दर्शन के लिए उमड़ने वाली भीड़ इस मंदिर को मंदसौर की विशिष्ट धार्मिक पहचान बनाती है।
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