थाली का चावल बढ़ा रहा ग्लोबल वार्मिंग! देश में धान के खेत हर साल छोड़ते हैं 97 लाख टन मीथेन; IISER के शोध में बड़ा खुलासा
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आइसर) भोपाल के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में धान के खेत हर साल ...और पढ़ें

धान की खेती। (इनसेट- आइसर विज्ञानी डॉ. धनलक्ष्मी पिल्लै और डॉ. सोनू यादव)
HighLights
सदी के मध्य तक उत्सर्जन 25 प्रतिशत तक बढ़ने की आशंका।
वैकल्पिक गीला-सूखा तकनीक उत्सर्जन 30-50% तक घटा सकती है।
शोध अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
अंजली राय, भोपाल। हमारी थाली में रोज परोसा जाने वाला चावल महत्वपूर्ण खाद्य जरूरत है, लेकिन यह जलवायु परिवर्तन के लिए भी जिम्मेदार है। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आइसर) भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के विज्ञानियों के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि भारत में धान के खेत हर साल करीब 97 लाख टन (9.7 मिलियन टन) मीथेन उत्सर्जित करते हैं।
यह मात्रा पूर्व के अनुमानों से अधिक है। इस निष्कर्ष के हवाले से दावा किया गया है कि धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
ऐसे किया शोध
अध्ययन में आइसर भोपाल के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग की विज्ञानी डॉ. धन्यलक्ष्मी पिल्लै और डॉ. मोनू यादव सहित अन्य विज्ञानियों ने यूरोप के कोपरनिकस कार्यक्रम से प्राप्त सैटेलाइट आंकड़ों का इस्तेमाल किया। शोधकर्ताओं ने 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर देश में धान की खेती का विस्तृत नक्शा तैयार किया। इससे अलग-अलग क्षेत्रों और मौसमों में धान की खेती तथा उससे जुड़े मीथेन उत्सर्जन का आकलन करने में मदद मिली।
शोधकर्ताओं के अनुसार सैटेलाइट सीधे मीथेन का मापन नहीं करते, बल्कि पानी से भरे उन खेतों की पहचान करते हैं, जहां मीथेन बनने की संभावना अधिक होती है। इन आंकड़ों को उत्सर्जन मॉडल के साथ जोड़कर मौसम के स्तर पर उत्सर्जन का अनुमान तैयार किया गया है।
खरीफ धान से निकलता है तीन-चौथाई मीथेन
डॉ. पिल्लै ने बताया कि मानसून के दौरान बोई जाने वाली खरीफ धान की फसल भारत में चावल से जुड़े मीथेन उत्सर्जन का करीब तीन-चौथाई हिस्सा पैदा करती है। देश में लगभग चार करोड़ हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती होती है। यह फसल खाद्य सुरक्षा के साथ करोड़ों किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है। ऐसे में उत्पादन बनाए रखते हुए इसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना बड़ी चुनौती है।
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खेत में पानी भरने से कैसे बनती है मीथेन?
धान के खेतों में लंबे समय तक पानी भरे रहने से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। ऐसे वातावरण में सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं और इस प्रक्रिया में मीथेन गैस बनती है। मीथेन वातावरण में कार्बन डायऑक्साइड की तुलना में कम समय तक रहती है, लेकिन गर्मी को रोकने की इसकी क्षमता अधिक होती है। इसलिए धान की खेती से होने वाला मीथेन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि तापमान बढ़ने और बारिश के बदलते पैटर्न के कारण सदी के मध्य तक धान से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में करीब 25 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसका असर खेती, फसल उत्पादन और किसानों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।
उत्सर्जन घटाने करना होगा यह उपाय
शोधकर्ताओं ने मीथेन उत्सर्जन कम करने के संभावित उपाय भी सुझाए हैं। इनमें खेत में बारी-बारी से पानी भरने और कुछ समय के लिए पानी निकालने की तकनीक प्रमुख है। इसे अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग यानी बारी-बारी से गीला और सूखा करने की तकनीक कहा जाता है। उचित तरीके अपनाने पर इससे मीथेन उत्सर्जन में करीब 30 से 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
