मध्य प्रदेश: प्रकृति से जोड़कर विज्ञान विषय को अर्चना ने बनाया आसान
डॉ. अर्चना शुक्ला ने विज्ञान को प्रकृति से जोड़कर पढ़ाने की अनूठी शैली विकसित की है, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिला है।

HighLights
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अर्चना शुक्ला का नवाचारी शिक्षण।
विज्ञान को प्रकृति और वास्तविक समस्याओं से जोड़कर पढ़ाती हैं।
गौरैया संरक्षण परियोजना और क्यूआर कोडिंग जैसे सफल प्रयोग।
अंजली राय, भोपाल। विज्ञान की पढ़ाई किताब के पन्नों तक सीमित न रहे, विद्यार्थी अपने आसपास की प्रकृति को देखें, सवाल पूछें, कारण तलाशें और प्रयोग के जरिये समाधान तक पहुंचें, भोपाल की महिला शिक्षक डॉ. अर्चना शुक्ला ने शिक्षण की ऐसी ही कुछ शैली विकसित की है। महात्मा गांधी सांदीपनि विद्यालय में विज्ञान पढ़ाने वाली डॉ. शुक्ला के लिए कक्षा की चारदीवारी सीखने की सीमा नहीं है।
वे पेड़-पौधों, पक्षियों, पर्यावरण और स्थानीय जैव विविधता को विद्यार्थियों की पढ़ाई से जोड़कर उन्हें पाठ का हिस्सा बना देती हैं। उनकी कक्षा में किसी विषय की शुरुआत सीधे परिभाषा से नहीं होती। विद्यार्थियों के सामने कोई सवाल या आसपास की वास्तविक समस्या रखी जाती है।
इसके बाद वे खुद जानकारी जुटाते हैं, प्रयोग करते हैं, परिणाम तक पहुंचकर समाधान का माडल तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में विज्ञान उनके लिए परीक्षा का विषय न रहकर रोजमर्रा के जीवन को समझने का माध्यम बन जाता है।

डॉ. शुक्ला ने इसी परियोजना आधारित अधिगम को अपने शिक्षण का आधार बनाया है। उनके इसी नवाचारी शिक्षण के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस साल उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया। गौरैया संरक्षण का उनका प्रयोग इसका एक उदाहरण है। वर्ष 2021 में जैव विविधता का पाठ पढ़ाते समय उन्होंने विद्यार्थियों से पूछा कि किस प्राणी को संरक्षण की सबसे अधिक जरूरत है। विद्यार्थियों ने गौरैया का नाम लिया। इसके बाद सवाल उठा कि गौरैया के सामने संकट क्या है और उसके संरक्षण के लिए क्या किया जा सकता है।
विद्यार्थियों ने शोध किया और प्राकृतिक आवास तथा घोंसलों की कमी को एक प्रमुख कारण के रूप में समझा। इसके बाद स्कूल और घरों में लगाए जा सकने वाले घोंसले तैयार करने का प्रयोग शुरू हुआ। अलग-अलग सामग्री और डिजाइन आजमाने के बाद विद्यार्थियों ने लकड़ी का स्पैरो हाउस माडल तैयार किया।
आगे चलकर इस परियोजना को वित्तीय सहयोग मिला और भोपाल के भेल क्षेत्र में करीब 200 स्पैरो हाउस लगाए गए। परियोजना का प्रस्तुतीकरण कंजर्वेशन एशिया कांग्रेस-2026 में भी हुआ और बाद में इसे सातवीं कक्षा की विज्ञान की पुस्तक में भी स्थान मिला।

गौरैया के इस प्रयोग की खासियत यह है कि विद्यार्थियों ने संरक्षण को केवल पढ़ा नहीं, उसे करके देखा। यही तरीका डॉ. शुक्ला की दूसरी परियोजनाओं में भी दिखाई देता है। वह पेड़ों की क्यूआर कोडिंग के जरिये विद्यार्थियों को पेड़ों की पहचान, उनकी विशेषताओं और उपयोग से जोड़ती हैं। 'सेव ए सीड-सेव ए ट्री' के माध्यम से बीजों के संरक्षण और पौध तैयार करने की प्रक्रिया समझाती हैं।
'बर्ड एंड बटरफ्लाई आइडेंटिफिकेशन' में विद्यार्थी अपने आसपास दिखने वाले पक्षियों और तितलियों की पहचान, व्यवहार और जैव विविधता में उनकी भूमिका दर्ज करते हैं। इस तरह किताब में पढ़ाया गया पर्यावरण का पाठ स्कूल परिसर और आसपास के क्षेत्र में जीवंत प्रयोग बन जाता है।
छात्र बोले-रोचक हो गई पढ़ाई
डॉ. शुक्ला की कक्षा में विद्यार्थी केवल शिक्षक से उत्तर सुनने वाले नहीं रहते, वे सवाल पूछने, तथ्य जुटाने और निष्कर्ष निकालने वाले बनते हैं। सांदीपनि विद्यालय के छात्र सचिन अहिरवार बताते हैं कि उन्हें पहले विज्ञान कठिन लगता था, पर माडल आधारित पढ़ाई से जीवविज्ञान में रुचि बढ़ी।
इसी तरह नीट उत्तीर्ण कर चुके छात्र सुमित कुशवाहा के अनुसार प्रायोगिक तरीके से पढ़ने के कारण जीवविज्ञान इतना रोचक हुआ कि वह आज भी रिवीजन में उसी तरीके का इस्तेमाल करते हैं।
अब शिक्षकों को तकनीक सिखा रहीं
रीवा में जन्मीं डॉ. शुक्ला का शिक्षण सफर करीब 30 वर्ष पहले दूरस्थ गांव के स्कूल से शुरू हुआ। सतना के शासकीय स्कूल में उन्होंने पेड़ों की क्यूआर कोडिंग जैसे प्रयोग किए। उनका मानना है कि विद्यार्थी का छोटा-सा विचार भी सही मार्गदर्शन मिलने पर बड़े बदलाव का आधार बन सकता है।
अब वह मध्य प्रदेश के विज्ञान शिक्षकों को परियोजना और माडल आधारित शिक्षण की तकनीक सिखा रही हैं, ताकि कक्षा में विज्ञान को प्रकृति और समाज से जोड़ने की यह शैली और स्कूलों तक पहुंचे।
